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सप्तम समुल्लास

अथ सप्तमसमुल्लासारम्भः विषय : ईश्वर और वेद जो सब दिव्य गुण-कर्म-स्वभाव-विद्यायुक्त और जिसमें पृथिवी सूर्य्यादि लोक स्थित हैं और जो आकाश के समान व्यापक, सब देवों का देव परमेश्वर है, उसको जो मनुष्य न जानते, न मानते और न उसका ध्यान करते, वे नास्तिक और दुखी होते हैं। इसलिये [...]

सप्तम समुल्लास2023-08-27T09:45:57+00:00

षष्ठ समुल्लास

अथ षष्ठसमुल्लासारम्भः विषय : राजधर्म —- जैसा परम विद्वान् ब्राह्मण होता है, वैसा विद्वान सुशिक्षित होकर क्षत्रिय को योग्य है कि इस सब राज्य की रक्षा न्याय से यथावत् करे। -मनुस्मृति 7//2    ईश्वर उपदेश करता है कि राजा और प्रजा के पुरुष मिलके सुख प्राप्ति और विज्ञानवृद्धिकारक राजा-प्रजा के [...]

षष्ठ समुल्लास2023-08-27T07:19:05+00:00

पंचम समुल्लास

अथ पंचमसमुल्लासारम्भः विषय : वानप्रस्थ और सन्यासाश्रम की विधि मनुष्यों को उचित है कि ब्रह्मचर्य्याश्रम समाप्त करके गृहस्थ, गृहस्थ होकर वानप्रस्थ और वानप्रस्थ होके संन्यासी होवें, अर्थात् यह अनुक्रम से आश्रम का विधान है। वानप्रस्थ को उचित है कि -मैं अग्रि में होम करके दीक्षित होकर व्रत, सत्याचरण और [...]

पंचम समुल्लास2023-08-24T15:46:45+00:00

चतुर्थ समुल्लास

अथ चतुर्थसमुल्लासारम्भः विषय : विवाह और गृहाश्रम का व्यवहार 'वह पुरुष या स्त्री गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने का अधिकारी है, जो आचार्यनुकूल वर्त्तता है, जिसका ब्रह्मचर्य खण्डित नहीं हुआ है और जिसने चारों या तीन या दो या कम से कम एक वेद को साङ्गोपाङ्ग पढ़ा है।' -मनुस्मृति [...]

चतुर्थ समुल्लास2023-08-24T15:17:52+00:00

सुख की वृद्धि के व्यवहारिक मंत्र

सुख की वृद्धि के व्यवहारिक मंत्र 'एक शांत और विनम्र जीवन, सफलता की भागदौड़ और उसके साथ आने वाली निरंतर बेचैनी से अधिक खुशी लाता है' - आइंस्टीन हमें दुखी करने वाली बातें दो तरह की होती हैं। एक तरह की बातें वे होती हैं, जिनको नियंत्रित करने [...]

सुख की वृद्धि के व्यवहारिक मंत्र2023-12-21T15:31:18+00:00

अपनी ईमानदारी पर पश्चाताप की भावना

अपनी ईमानदारी पर पश्चाताप की भावना जो व्यक्ति अपने ईमानदार होने पर पश्चाताप करता है, वह बेईमान व्यक्ति से भी बदतर है, क्योंकि एक बेईमान व्यक्ति बेईमान होने का सुख तो भोगता है, लेकिन एक ईमानदार व्यक्ति, जो अपने ईमानदार होने पर पश्चाताप करता है, बेईमानी के सुखों [...]

अपनी ईमानदारी पर पश्चाताप की भावना2022-03-26T13:15:06+00:00

सुखी और शांत रहने के वैयक्तिक नियम

सुखी और शांत रहने के वैयक्तिक नियम सुखी और शांत रहने के नियम बहुत ही सरल हैं और इसके लिए बड़े-बड़े ग्रंथों के अध्ययन की आवश्यकता नहीं है। सुखी और शांत रहने के नियम - 1 प्रातः जल्दी उठें, यानि सुबह 4 से 7 के बीच। सुबह जल्दी [...]

सुखी और शांत रहने के वैयक्तिक नियम2023-12-21T15:54:46+00:00

मन का शीघ्रकारी होना – एक वरदान

मन का शीघ्रकारी होना - एक वरदान ईश्वर-प्राप्ति के उच्च लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए, हमें विशाल शक्तियों वाला मन प्रदान किया गया है। यदि कोई व्यक्ति, विशाल शक्तियों वाले इस 'मन' को नियंत्रित नहीं कर पाता, तो उस व्यक्ति को अपनी असफलता के लिए 'मन' को [...]

मन का शीघ्रकारी होना – एक वरदान2022-03-26T13:12:42+00:00

मनुष्य और ईश्वर के कार्यों में मौलिक भेद

मनुष्य और ईश्वर के कार्यों में मौलिक भेद  मनुष्य अंशों में कार्य करता है, जबकि ईश्वर का कार्य पूर्णता को लिए हुए होता है।  उदाहरण के लिए, भवन का निर्माण करते समय मनुष्य पहले नींव, फिर दीवारें, उसके बाद छत आदि का निर्माण करता है। लेकिन, ईश्वर हमारे [...]

मनुष्य और ईश्वर के कार्यों में मौलिक भेद2022-03-26T13:09:41+00:00

उपनिषदों और दर्शनों में अंतर

उपनिषदों और दर्शनों में अंतर उपनिषद अनुभवों का उल्लेख करते हैं, जबकि 'दर्शन' तर्क का उल्लेख करते हैं, अर्थात उपनिषद, ईश्वर के अस्तित्व की बात करते हुए इस तथ्य को साबित करने की कोशिश नहीं करते, लेकिन 'दर्शन' तर्क के माध्यम से ईश्वर के अस्तित्व के सत्य को [...]

उपनिषदों और दर्शनों में अंतर2022-03-26T13:11:27+00:00
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