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परमात्मा जिसे चाहेगा, उसे अपना स्वरूप प्रकट करेगा

शंका १:–  कठोपनिषद (२//२२) का वचन है- नायमात्मा–से–तनूं स्वाम्।   यह आत्मा न प्रवचन से, न मेधा बुद्धि से, न सत्संग से प्राप्त करने योग्य हैं, जिसको यह आत्मा (परमात्मा) स्वयं स्वीकार करता है, उसी को यह प्राप्त होता है, उसी को यह अपना स्वरूप प्रकट करता हैं।  यहाँ [...]

परमात्मा जिसे चाहेगा, उसे अपना स्वरूप प्रकट करेगा2023-10-05T15:30:42+00:00

क्या व्यक्ति को बुरे कर्म करने के पश्चात अन्य सभी योनियों को भोगना पड़ेगा अथवा

शंका २–  क्या व्यक्ति को बुरे कर्म करने के पश्चात अन्य सभी योनियों को भोगना पड़ेगा अथवा कुछ योनियों के पश्चात् वापस मानव जन्म मिलेगा? समाधान–  एक व्यक्ति ने 20 हजार रुपये की चोरी की, दूसरे व्यक्ति ने दो अरब रुपये की चोरी की। वस्तुतः चोरी दोनों ने की, इसलिए [...]

क्या व्यक्ति को बुरे कर्म करने के पश्चात अन्य सभी योनियों को भोगना पड़ेगा अथवा2023-09-07T12:27:11+00:00

राजा या न्यायाधीश किसी को जो दण्ड या पुरस्कार देता है, क्या वह कर्मफल नहीं है?

प्रश्न १२– राजा या न्यायाधीश किसी को जो दण्ड या पुरस्कार देता है, क्या वह कर्मफल नहीं है? यदि है तो फिर ईश्वर के अतिरिक्त भी कर्मफल देने वाले हुए। उत्तर– जैसा कि कहा जा चुका है कि वेदों में परमेश्वर ने मानवमात्र के लिए कर्तव्य–अकर्तव्य का उपदेश दिया [...]

राजा या न्यायाधीश किसी को जो दण्ड या पुरस्कार देता है, क्या वह कर्मफल नहीं है?2023-09-07T12:19:13+00:00

हमारे विचार में मित्र व शत्रु सुख दुख के कारण नहीं निमित्त हैं।

प्रश्न ११– हमारे विचार में मित्र व शत्रु सुख दुख के कारण नहीं निमित्त हैं। मित्र हि तचिन्तन कर सकते हैं। हित करने का भरसक यत्न भी कर सकते हैं। इसी प्रकार शत्रु अहित चिन्तन भी कर सकते हैं और अहित करने का भरसक प्रयत्न भी कर सकते हैं, [...]

हमारे विचार में मित्र व शत्रु सुख दुख के कारण नहीं निमित्त हैं।2023-09-07T12:14:37+00:00

क्या प्रत्येक मनुष्य की योनि कर्मयोनि है और अन्य सभी प्राणी भोगयोनि में हैं?

प्रश्न १०– क्या प्रत्येक मनुष्य की योनि कर्मयोनि है और अन्य सभी प्राणी भोगयोनि में हैं? उत्तर– कर्तृत्व ओर भोक्तृव्य जीव के स्वाभाविक गुण हैं। इनसे जीव कभी भी मुक्त नहीं हो सकता। हाँ, भिन्न-भिन्न योनियों के कारण इनमें न्यूनता और आधिक्य हो सकता है, किन्तु इनका सर्वथा लोप [...]

क्या प्रत्येक मनुष्य की योनि कर्मयोनि है और अन्य सभी प्राणी भोगयोनि में हैं?2023-09-07T12:11:20+00:00

यदि ईश्वर जीव को न बनाता और न सामर्थ्य देता, तो

प्रश्न ९– यदि ईश्वर जीव को न बनाता और न सामर्थ्य देता, तो जीव कुछ भी न कर सकता था। अतः ईश्वर की प्रेरणा से ही जीव कर्म करता है। यही मानना उपयुक्त है। उत्तर– जीवात्मा अनादि, अनुत्पन्न और अविनाशी है। श्रीमद्-भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय में भी कहा है- [...]

यदि ईश्वर जीव को न बनाता और न सामर्थ्य देता, तो2023-09-07T12:07:50+00:00

यदि ईश्वर जीव द्वारा किए जाने वाले कर्मों को साथ-साथ ही जानता है तो

शंका ८ – यदि ईश्वर जीव द्वारा किए जाने वाले कर्मों को साथ-साथ ही जानता है, तो उसका ज्ञान एकरस और अखण्डित कहाँ रहा? क्योंकि उसके ज्ञान में वृद्धि होती रहेगी। समाधान -  परमेश्वर अपनी सर्वज्ञता से जीवों के कर्म करने की क्षमता को, कर्म के प्रकारों को पूर्णतः जानता है। जिससे उसके [...]

यदि ईश्वर जीव द्वारा किए जाने वाले कर्मों को साथ-साथ ही जानता है तो2023-09-07T12:04:58+00:00

ईश्वर यदि भविष्यत् की बातों को नहीं जानता, तो वह सर्वज्ञ कहाँ रहा?

शंका ७ –ईश्वर यदि भविष्यत् की बातों को नहीं जानता, तो वह सर्वज्ञ कहाँ रहा? समाधान –  ईश्वर की सर्वज्ञता का अर्थ है-सभी जानने योग्य बातों को जानना। भविष्य में होने वाली घटनाएं दो प्रकार की होती हैं एक जो किसी नियम पर आधारित होती हैं। जैसे सूर्यादि का उदय -अस्त होना। [...]

ईश्वर यदि भविष्यत् की बातों को नहीं जानता, तो वह सर्वज्ञ कहाँ रहा?2023-09-07T12:01:12+00:00

परमेश्वर त्रिकालदर्शी है, इससे भविष्यत् की बातें जानता है।

शंका ६  – परमेश्वर त्रिकालदर्शी है, इससे भविष्यत् की बातें जानता है। वह जैसा निश्चय करेगा, जीव वैसा ही करेगा। इससे जीव स्वतन्त्र नहीं। और जीव को ईश्वर दण्ड भी नहीं दे सकता। क्योंकि जैसा ईश्वर ने अपने ज्ञान से निश्चित किया है, वैसा ही जीव करता है। समाधान –  ईश्वर को त्रिकालदर्शी [...]

परमेश्वर त्रिकालदर्शी है, इससे भविष्यत् की बातें जानता है।2023-09-07T11:59:09+00:00

मनुष्य को स्वतन्त्र कहना अनुचित है। क्योंकि ईश्वर की इच्छा बिना तो पत्ता भी नहीं हिलता।

शंका ५ – मनुष्य को स्वतन्त्र कहना अनुचित है। क्योंकि ईश्वर की इच्छा बिना तो पत्ता भी नहीं हिलता। समाधान –  उपनिषद् में कहा है-स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च। (श्वेताश्वर उपनिषद् ६//८) अर्थात् ईश्वर का ज्ञान, बल और क्रिया स्वाभाविक है। उसमें मनुष्य जैसी इच्छा नहीं है। क्योंकि इच्छा भी अप्राप्त, उत्तम और जिसकी प्राप्ति [...]

मनुष्य को स्वतन्त्र कहना अनुचित है। क्योंकि ईश्वर की इच्छा बिना तो पत्ता भी नहीं हिलता।2023-09-07T11:57:31+00:00
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