शंका ८ – यदि ईश्वर जीव द्वारा किए जाने वाले कर्मों को साथ-साथ ही जानता है, तो उसका ज्ञान एकरस और अखण्डित कहाँ रहा? क्योंकि उसके ज्ञान में वृद्धि होती रहेगी।

समाधान –  परमेश्वर अपनी सर्वज्ञता से जीवों के कर्म करने की क्षमता को, कर्म के प्रकारों को पूर्णतः जानता है। जिससे उसके ज्ञान में कोई वृद्धि नहीं होती। जैसे कोई अध्यापक अपनी प्राथमिक कक्षा के सभी बच्चों की क्षमता को भलीभांति जानता है। अब जब वह बच्चों से १00 तक गिनती सुनाने को कहता है तो कोई बच्चा ५0 तक, कोई ६0 तक और कोई १00 तक भी सुना देता है। यहाँ अध्यापक बच्चों के गिनती सुनाने के कर्म को साथ-साथ तो जानता है परन्तु इससे उसके गिनती विषयक ज्ञान में कोई वृद्धि नहीं होती। क्योंकि अध्यापक का १00 तक की गिनती का ज्ञान पहले से ही था।

इसी प्रकार ईश्वर, किन-किन जीवों ने कैसा और कितना कर्म किया है, इसे जीवों के कर्म के साथ-साथ ही जानता है, पहले से नहीं। और न इससे उसके ज्ञान में कोई वृद्धि होती है। उसके ज्ञान में वृद्धि, तब तो मानी जा सकती थी, यदि जीव का कोई कर्म उसके लिए नया होता। किन्तु ईश्वर तो जीवों की कर्म क्षमता और कर्म के सभी प्रकारों को पहले से ही जानता है। अतः उसका ज्ञान पूर्ण, उसे निरन्तर ज्ञान रहता, एक क्षण भी ऐसा नहीं आता कि उसे कोई ज्ञान न हो इसलिए एकरस और अखण्डित है।  

                                                                                                         -डाक्टर धीरज कुमार आर्य