खण्ड ६ (हवन के मन्त्रों के छुपे हुए अर्थ)

अष्टम सोपान समानमन्त्र

‘सूर्यो ज्योतिः’ तथा ‘अग्निर्ज्योतिः’ के मन्त्रों की व्याख्या के बाद क्रमशः निम्न मन्त्रों की व्याख्या करते हैं-

.    ओम् भूरग्नये प्राणाय स्वाहा। इदमग्नये प्राणाय इदन्न मम।

.     ओम् भुवर्वायवेऽपानाय स्वाहा। इदं वायवेऽपानाय इदन्न मम।

.     ओम् स्वरादित्याय व्यानाय स्वाहा। इदमादित्याय व्यानाय इदन्न मम।

.     ओम् भूर्भुवः स्वरग्निवाय्वादित्येभ्यः प्राणापानव्यानेभ्यः स्वाहा।

इदमग्निवाय्वादित्येभ्यः प्राणापानव्यानेभ्यः इदन्न मम।

इन मन्त्रों के समान्य रूप से अर्थात् भौतिक दृष्टि से अर्थ इस प्रकार हैं-

१.    भूः अर्थात् भूमि स्थित अग्नि के लिए तथा प्राण के लिए यह आहुति समर्पित है। यह मेरा समर्पण अहंभाव से युक्त न हो।

२.    भुवः अर्थात् अन्तरिक्ष स्थित वायु की शुद्धि के लिए जिससे शरीर स्थित मल बाहर हो जाये, उस अपान के लिए यह आहुति समर्पित है। यह मेरा समर्पण अहंभाव से युक्त न हो।

३.    स्वः अर्थात् द्युलोक स्थित आदित्य के लिए जिसकी कृपा से सर्वत्र गतिशीलता है, उस शुद्ध गतिशीलता के लिए यह आहुति समर्पित है। यह समर्पण अहंभाव से रहित हो।

४.    भूलोक, अन्तरिक्षलोक तथा द्युलोक में स्थित क्रमशः अग्नि, वायु तथा आदित्य के लिए, जिससे इनका सम्यक् ज्ञान प्राप्त कर, इनसे विध प्रकार के लाभ लेकर मानव शरीर में स्थित प्राण-अपान -व्यान सबल हो सके, उसके लिए यह आहुति समर्पित है। यह समग्र समर्पण अहं भाव के विनाश के लिए है।

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अब आध्यात्मिक दृष्टि से इन मन्त्रों पर विचार करेंगे।

हमारा समग्र जीवन चार सम्पदाओं से युक्त है-

प्रथमा सम्पदा– ज्ञानेन्द्रिय एवं कर्मेन्द्रिय से समन्वित यह शरीर है।

द्वितीय सम्पदा‘संकल्पविकल्पात्मकं मनः’ के अनुसार संकल्प -विकल्प युक्त मन है। दार्शनिकों ने-‘युगपद् ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो लिंगम्’ कहकर यह स्पष्ट संकेत दिया कि एक समय में एक ही इन्द्रिय से संयुक्त रहकर मन क्रियाशील रहता है।

तृतीया सम्पदा– बुद्धि है। बुद्धि के विषय में दार्शनिकों का स्पष्ट एवं समीचीन विचार है ‘निश्चयात्मिका वृत्तिर्बुद्धिः’ अर्थात् संकल्प -विकल्प वाले मन की दशा को निश्चित दिशा की ओर अग्रसर करने वाली वृत्ति बुद्धि है। इस बुद्धितत्व से ही हम बन्धन से छूट सकते हैं, बिना इसके नहीं। तभी तो उपनिषद् के ऋषि कहते हैं- ‘ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः’ बिना ज्ञान के मुक्ति नहीं मिलती है। गीता में बुद्धि के महत्त्व को इन शब्दों में स्पष्ट किया है-

                                  ‘ हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते               

  –गीता ४//३८

अर्थात् ज्ञान के समान इस संसार में पवित्र कुछ भी नही हैं।

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चतुर्थ सम्पदा– जिसके बिना समस्त इन्द्रियों सहित शरीर, मन, बुद्धि आदि के व्यापार बन्द हो जाते हैं, शरीर का कोई मूल्य नहीं रहता। कितना भी कोमल हो, प्रिय हो, हितैषी हो, त्यागने योग्य हो जाता है, जलाने आदि योग्य हो जाता है, वह है आत्मसम्पदा। इस आत्म-सम्पदा को वेद ने -‘अनिपद्यमानम्’ अर्थात् अविनाशी कहा है।

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इन चारों सम्पदाओं में – शरीरसम्पदा (इन्द्रिय-सम्पदा), मनःसम्पदा और बुद्धिसम्पदा, ये तीन सम्पदायें साधन हैं। इन सम्पदाओं से आत्म-सम्पदा को पुष्ट बनाना है। इन सम्पदाओं में प्रथम तीन सम्पदाएँ जड़ है, चतुर्थ आत्म-सम्पदा चेतन है। चेतन तत्व ही उत्तरदायी होता है किसी भी साधन के सदुपयोग या दुरुपयोग का। बन्दूक की गोली किसी के मारे जाने पर उत्तरदायी नहीं होती है, बन्दूकधारी चेतन तत्व ही उत्तरदायी होता है। क्योंकि चेतन तत्व इन तीन सम्पदाओं का, साधनों का स्वामी है।

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भूरग्नये प्राणाय अर्थात् इन्द्रियों सहित शरीर-साधना की पुष्टि के लिए शरीरस्थ अग्नितत्व की पुष्टि के लिए तथा तदनुकूल प्राणों की समुचित प्रगति के लिए यहाँ प्रथम आहुति समर्पित है।

भुवर्वायवेऽपानाय– इस मन्त्र द्वारा मनः संचालित इन्द्रियों की गति, वायवे-वा गतिगन्धनयोः’ के आधार पर प्रत्येक गति सुगन्धमय अर्थात् यशः परिपूर्ण शुद्धपूर्ण शुद्धगति-शुद्ध व्यवहार की साधना के लिए तथा अपानाय- ‘दूरीकरणाय’ दोषपूर्ण मन की गति के निवारण के लिए -‘परोऽपेहि मनस्पाप किमशस्तानि संचरसे.’ अर्थात् हे दोषयुक्त मार्ग पर चलने वाले मन तू पापभावना से दूर हो, इस वेदवचनानुसार मन को पापभावना से दूर करने के लिए यह द्वितीय आहुति है।

स्वरादित्याय व्यानाय-तृतीय आहुति स्वरादित्याय-बुद्धियोग द्वारा आदित्याय – अखण्डित (दो अवखण्डने) जो खण्डित न हो ऐसे सुख या आनन्द की प्राप्ति के लिए, व्यानाय अर्थात् ‘व्यानयति चेष्टयति प्राणादि सकलं जगत् व्यानःसर्वाधिष्ठानं बृहद् ब्रह्म (महर्षि दयानन्द, पञ्चमहायज्ञविधि) सर्वव्यापक ब्रह्म की उपासना के लिए समर्पित है।

चतुर्थ मन्त्र -पुनः समग्रता के साथ समन्वय की भावना से अर्थात् इन्द्रियों सहित शरीरसम्पदा, शुभसंकल्प युक्त मनसम्पदा तथा सद्ज्ञान युक्त बुद्धिसम्पदा द्वारा सदाचरण से आत्मा सम्पदा अर्थात् आत्मोन्नति द्वारा ब्रह्मानन्द प्राप्त्यर्थ यह यज्ञ कर्म है।

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आज के युग में आत्म तत्व को विस्मृत कर साधनों की तृप्ति की इस भौतिकता की लालसा विलासिता को जन्म देती है और यही विलासिता अकर्मण्यता की जननी है।

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मात्र साधनों को उन्नति में संलग्न भौतिक उन्नति आत्म-विकास के मार्ग को अमृतत्व की प्राप्ति को अवरुद्ध कर देती है। मैत्रेयी के यह पूछने पर-

        यदीयं सर्वा पृथिवी वित्तेन पूर्णा स्यात् तत्कि तेनाहममृता स्याम्?

यदि यह सारी पृथ्वी धन से पूर्ण हो जायेगी तो क्या मैं उससे अमर हो जाऊँगी? ऋषि याज्ञवल्क्य ने घोषणा की थी कि अमृत्व की आशा भी धन से व्यर्थ है-

        ‘अमृतत्त्वस्य तु नाशास्ति वित्तेन

तभी विदुशी मैत्रयी ने भौतिक सम्पत्ति को अस्वीकार करते हुए कहा-

                                    ‘येनाहं नामृता स्यां किमहं तेन कुर्याम्         

  –बृहदारण्यक ४//५//३

जिससे मेरी आत्म -उन्नति न हो या मुझे अमृतत्व की प्राप्ति न हो उस भौतिक सम्पदा को स्वीकार क्यों करूँ?

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महर्षि दयानन्द की आर्ष बुद्धि का चमत्कार देखिये कि मानवमात्र के कल्याण के लिए उन्होंने इस ‘दैनिक यज्ञ-पद्धति’ के क्रम का निर्माण किया। उक्त मन्त्रों का संकलन उनकी आर्ष बुद्धि की देन है। प्रश्न है ये मन्त्र कहाँ से लिये गये हैं? इसका उत्तर ‘ऋग्वेदादिभाष्यभूकिा’ पञ्चयज्ञ प्रकरण में वर्णित है-

        ‘सर्वे मन्त्रास्तैत्तिरीयोपनिषदाशयेनकेत्रीकृताः

अर्थात् ये सब मन्त्र तैत्तिरीय उपनिषद् का आशय लेकर एकत्र किये गये हैं।

महर्षि दयानन्द दूरदर्शी थे, अपने समय के प्रचलन के अनुसार वे यह जान गये थे कि घोर भौतिक युग आने वाला है। इस युग के आने पर मानवता, मानवीय गुण समाप्त हो जायेंगे। मानव अपने मिथ्या गौरव के लिए जो वैज्ञानिक साधन अपनायेगा, वे साधन पर्यावरण को दूषित करेंगे। इसीलिए महर्षि ने यज्ञ में घृत के साथ सुगन्धित-पुष्टिकारक, मिष्ट और रोगनाशक वस्तुओं से निर्मित सामग्री का विधान किया। मन्त्रोच्चारण आध्यात्मिक साधना को सबल बनाते हैं तो घृत के साथ सुगन्धित द्रव्यों की आहुतियों से पर्यावरण शुद्ध होकर संसार को लाभ पहुँचता है।

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इस प्रकार ये आहुतियाँ जहाँ परमेश्वर की असीम दया का स्मरण कराती हैं, वहाँ ये स्पष्ट रूप से मानव जीवन को अपने लक्ष्य को प्राप्त करने की ओर अग्रसर करती हैं। संसार अनेक उलझनों एवम् आकर्षणों से भरा पड़ा है। संसार के इन आकर्षणों की चकाचैंध के सामने मानव अपने उद्देश्य को, अपने साध्य को भूल जाता है।

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महर्षि ने प्रथम आहुति शरीर (इन्द्रियों) की साधना के लिए, इनको स्वस्थ सबल व पुष्ट करने के लिए प्रदान करने का विधान किया।

द्वितीय मन्त्र अन्तःकरण स्थित मन की साधना के लिए है।

तृतीय मन्त्र मन से ऊपर उठकर बुद्धि तत्व, ज्ञान तत्व के विकास के लिए है।

चतुर्थ मन्त्र तीनों के समन्वित विकास क्रम से आत्म -साधना की पुष्टि के लिए, आनन्द प्राप्ति इस साध्य की प्राप्ति के लिए है। यजुर्वेद का मन्त्र है-

        प्रथिव्याऽहमदन्तरिक्षमारुहमन्तरिक्षाद्दवमारुहम्।

        दिवो नाकस्य पृष्टात् स्वर्ज्योतिरगामहम्।।   

-यजुर्वेद १७//६७

मैं (यज्ञकर्त्ता) इस पृथिवी-शरीर से ऊपर उठकर अन्तरिक्ष अर्थात् अन्तःकरणस्थित मनोभाग में प्रवेश कर द्युलोक अर्थात् मस्तिष्क में स्थित बुद्धि -तत्वज्ञान को प्राप्त कर उससे ऊपर उठकर आत्मतत्व को जानकर आनन्दमय ज्योतिःस्वरूप  ब्रह्म को प्राप्त कर लूँ। ब्रह्मानन्द प्राप्ति ही जीवन का लक्ष्य है, साध्य है।

इस प्रकार महर्षि ने इन मन्त्रों के माध्यम से सामान्य से सामान्य विचार वाले व्यक्ति को, जड़ तत्वों को साधन मानकर चेतन आत्मतत्व को आनन्द प्राप्ति का मार्ग दया पूर्वक दिखाकर अपने दयानन्द नाम को सार्थक किया।

ब्रह्म स्वरूप प्रतिपादक मन्त्र

पिछले मंत्रों में आत्म-सम्पदा अर्थात् आत्मोन्नति द्वारा ब्रह्मानन्द को प्राप्त करना जीवन का लक्ष्य वर्णित किया गया है। यहाँ एक स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि जिसका आनन्द प्राप्त करना जीवन का लक्ष्य है, उस ब्रह्म का स्वरूप क्या है? इसके समाधनार्थ महर्षि ने अग्रिम मंत्र से आहुति देने का विधान किया। मंत्र इस प्रकार है-

ओम आपो ज्योतिरसोSमृतं ब्रह्म भूर्भुवः स्वरों स्वाहा।।

-तैत्तिरीय आरण्यक १०//१५

मन्त्र में ‘आपः’ शब्द पढ़ा है जिसका अर्थ है सर्वव्यापक। मन्त्र में ‘ज्योतिः’ शब्द विद्यमान है। यह शब्द परमात्मा को ज्योतिःस्वरूप, प्रकाशस्वरूप है, ऐसा वर्णन कर रहा है। याज्ञिक इस पर प्रश्न करता है कि प्रकाशस्वरूप तो सूर्य-चन्द्र-तारे विद्युत् अग्नि भी है क्या ये ही ब्रह्म हैं? इसके उत्तर में कठोपनिषद् का वचन है-

तत्र सूर्यो भाति चान्द्रतारकम् नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः। तमेव भान्तमनुभाति सर्वम्, तस्य भासा सर्वमिदं विभाति।।                                                  

कठोपनिषद् २//२//१५

उस ब्रह्म के प्रकाश के सामने सूर्य-चन्द्र-तारे-विद्युत का भी प्रकाश नगण्य है, यह अग्नि तो कुछ भी नहीं है। उस ब्रह्म के महान् प्रकाश से ये सब प्रकाशित है।

याज्ञिक पुनः प्रश्न करता है कि सूर्य विद्युत-अग्नि आदि का प्रकाश तो तपनयुक्त है, तपाने वाला है क्या ब्रह्म का प्रकाश भी ऐसे ही ताप से युक्त है?

मन्त्र में निहित ‘रसः’ शब्द इसका समाधान करता है। ‘रसः’ का अर्थ है-आनन्दस्वरूप । वह ब्रह्म तो आनन्दस्वरूप है। तैत्तिरीय उपनिषद् का वचन है-

        ‘रसो वै सः, रसं ह्मेवायं लब्ध्वा आनन्दी भवति

तैत्तिरीय उपनिषद् २//७//१

वह परमात्मा रसस्वरूप है, आनन्दस्वरूप है उसको प्राप्त कर व्यक्ति आन्दमय हो जाता है।

जिज्ञासु पुनः शंका करता है कि रस- आनन्द तो सांसारिकता में भी है। धन की प्राप्ति में रस है।

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मन्त्र में विद्यमान अगला शब्द इसका समाधान करता है। ब्रह्मानन्द तो ‘अमृतम्’ है अर्थात् अमृतस्वरूप है। शीघ्र समाप्त होने वाला नहीं है।

सांसारिक सुख तो क्षणिक है। धन से सुख के साधन प्राप्त हो जाते हैं, पर सुख नहीं, हां सुखाभास प्राप्त होता है, वह क्षणिक होता है।….

एक न एक दिन सब इन्द्रियों का तेज शिथिल हो ही जाता है। अतः इनमें क्षणिक इन्द्रियों की तृप्ति भले ही हो, पर आत्मानन्द नहीं, जिसकी मन्त्र ने ‘अमृतम्’ अमृत-स्वरूप कहा है।

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याज्ञिक पुनः प्रश्न करता है कि उस महान ब्रह्म का सबके द्वारा सरलता से ग्रहण करने योग्य नाम क्या है?

इसके उत्तर में मन्त्र में वर्णित ‘ओम्’ शब्द है। ‘ओम्’ परमेश्वर का सर्वग्राह्य सर्वश्रेष्ठ नाम है। याज्ञिक को ‘ओम्’ के उच्चारण के साथ ही यह भाव ले लेना चाहिए कि वह प्रभू सर्वथा सब प्रकार से मेरी रक्षा कर रहा है।

यज्ञकर्त्ता का प्रश्न है इस मन्त्र में ‘स्वाहा’ शब्द से क्या भाव लेना चाहिए?

निरुक्त ८//२० के अनुसार ‘स्वाहा’ का एक अर्थ यह भी है-‘सु आह इति वा’! अर्थात् इस मन्त्र में वर्णित परमेश्वर के स्वरूप को सुन्दर, सत्यरूप में मन-वचन-कर्म को स्वीकृत करते हुए ‘स्वाहुतं हविर्जुहोति इति वा’ अर्थात् इस आहुति के साथ मैं अपने आपको लोक-कल्याण कर्म में समर्पित करता हूँ।

मेधा बुद्धि प्रार्थना मन्त्र

आपो ज्योति.’ मन्त्र के बाद उक्त मन्त्र महर्षि ने किस अभिप्राय से रखा? इस पर चिन्तन करने के बाद ‘यां मेधाम्’ मन्त्र रखना उचित लगता है तथा ऋषि-प्रतिभा के प्रति श्रद्धाभाव भी उत्पन्न होता है।

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संसार के मायाजाल में साधारण या सामान्य बुद्धि फंस सकती है। ऐसा लोक-व्यवहार से भी प्रत्यक्ष है। अतः बुद्धि चाहिए जो किसी भी दशा में इन आकर्षणों में न फंसे तथा गृहीत व्रत से, संकल्प से विचलित न हो, उसके लिये जिस बुद्धि की आवश्यकता है, उस बुद्धि की संज्ञा है, मेधा बुद्धि। इस मेधा बुद्धि की शीघ्र आवश्यकता है, अतः मन्त्र में ‘अद्य’ अर्थात् अभी इसी समय से, आज से ही मेधा प्राप्त हो, की प्रार्थना है। क्रम प्राप्त मन्त्र इस प्रकार है-

        ओं यां देवगणाः पितरश्चोपासते। तया मामद्य मेधयाऽग्ने मेधाविनं कुरु स्वाहा।

                                                               –यजु0 ३२//१४

अग्ने हे स्वप्रकाशस्वरूप, सर्वज्ञ परमात्मन्! यां मेधां आपकी कृपा से जिस मेधां शुभाशुभ विवेक समर्थ बुद्धि का अथवा सत्यविद्या-सहित शुभगुणों को धारण करने योग्य बुद्धि को देवगणाः विद्वत् समूह पितरः और हमारे माता-पिता आदि तथा अन्य ज्ञानवृद्ध पूर्वज गण उपासते अर्थात् समीप से सेवन करते हैं तया  मेधया उस सर्वोत्तम बुद्धि से माम अद्य  मुझको आज अर्थात् शीघ्र मेधाविनं कुरु प्रशस्त बुद्धिवाला कीजिये। स्वाहा यह पूर्ण समर्पण भाव से आहुति प्रदान करता हूँ। हे परमात्मन् मेरी इस प्रार्थना को स्वीकार कर मुझे सर्वोत्तम बुद्धिवाला बनाईये।

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मेधा बुद्धि वह बुद्धि है जिसके प्राप्त होने पर व्यक्ति जीवन में बड़े से बड़े कष्ट आने पर भी गृहीत व्रत से, संकल्प या सदाचरण के मार्ग से पृथक् नहीं होता।

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केवल वेदों के मर्मज्ञ मात्र, सर्वशास्त्र धुरीणमात्र विविध ज्ञान विज्ञान निष्णात जन मात्र, मेधा बुद्धि वाले नहीं कहलाते हैं। हम देखते हैं अनेक लोग शास्त्रों के कठिन से कठिन बातों को सरल प्रभावशाली शब्दों में व्यक्त करने में कुशल हैं, लोभ, क्रोध, ईर्ष्या–द्वेष आदि दुर्गुणों पर इतनी सुन्दर आख्या प्रस्तुत कर देंगे कि सब सामान्य श्रोता उसको त्यागने का क्षणिक संकल्प भी ले लेगा किन्तु मञ्च से उतरते ही वे क्षण भर में क्रोध के आवेश से घिर जायेंगे, दूसरे के महत्त्व  को सारहीन सिद्ध कर निन्दक बन जायेंगे, ईर्ष्या–द्वेष के भीषण ताप में जलेंगे। ऐसे लोग शास्त्रज्ञ तो हो सकते हैं पर उनकी संज्ञा मेधावी नहीं होगी।

वेद के आधार पर ‘मेधा’ शब्द के दो अर्थ किए जाते हैं- एक, आध्यात्मिक विद्या को ग्रहण करने योग्य समझ और दूसरी भौतिक विद्या को ग्रहण करने वाली समझ। हमारी उन्नति के लिए आवश्यक है कि हम केवल आध्यात्मिक विद्या या केवल भौतिक विद्या को ग्रहण न करें, बल्कि इन दोनों तरह की विद्या का सामंजस्य अपने जीवन में स्थापित करें। जिस व्यक्ति के पास केवल आध्यात्मिक ज्ञान है, भौतिक अर्थात उसके व्यवहार से सम्बन्धित ज्ञान नहीं है, वह व्यक्ति अन्दर से तो सुखी होता है, परन्तु बाहर से बहुत दुखी होता है और जिस व्यक्ति के पास केवल भौतिक अर्थात उसके व्यवहार से सम्बन्धित ज्ञान है, आध्यात्मिक ज्ञान नहीं है, वह व्यक्ति बाहर से तो सुखी होता है, परन्तु अन्दर से बहुत दुखी होता है। आत्मा को न अन्दर का दुख चाहिए और न बाहर का दुख। इसलिए, इस मंत्र में इन दोनों तरह की विद्या को ग्रहण करने योग्य बुद्धि की प्राप्ति के लिए प्रार्थना की गई है। यहाँ, पढ़ा जाने वाला ‘देवगणः’ शब्द का तात्पर्य है- आध्यात्मिक विद्या को प्राप्त कर भोगने वाले व्यक्ति और ‘पितरः’ शब्द का तात्पर्य है- भौतिक विद्या को प्राप्त कर भोगने वाले व्यक्ति।

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यमाचार्य ने नचिकेता के सामने संसार के समस्त आकर्षणों का जाल प्रस्तुत किया-

सैकड़ों आयु वाले पुत्र-पौत्र, बहुत से पशु तथा सुवर्ण, पृथिवी का विशाल राज्य, दीर्घायुश्य, दुर्लभ सुन्दरियां, नृत्यगान आदि सब ले ले।

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धन्य है नचिकेता जिसकी समझ ने तीन बातें कहकर सबको अस्वीकार कर दिया-

१.    ‘श्वोभावाः’ आज है कल नहीं रहेगी।

२.    ‘सर्वेन्द्रियाणां जरयन्ति तेजः’ सारी इन्द्रियां एक दिन अवश्य शिथिल हो जायेंगी, अतः वासनाओं के जाल में नहीं फंसना है।

३.    ‘ वित्तने तर्पणीयो मनुष्यः’ धन से तो आज तक कोई मनुष्य तृप्त नहीं हुआ।

यह महान् कार्य वही कर सकता है जिसने अपने ज्ञान को आचरण में उतार लिया है। ऐसा ज्ञान ही मेधा बुद्धि के अन्तर्गत है।

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वर्त्तमान में अच्छे-अच्छे ज्ञानसम्पन्न, महान् तार्किक, भाषणशूर, गेरुए वस्त्रधारी भी धन के लिए, पद के लिए, सम्मान के लिए, प्रशंसा के लिए लालायित है। भाषणों में, पारायण यज्ञों को सम्पन्न कराते हुए भी जीवन को यज्ञमय नहीं बना सके। वित्तैषणा, लोकैषणा व शिष्यैषणा के जाल में घिरे हुए हैं।

इस सब से बचने के लिए ही तो याज्ञिक इस मन्त्र में शीघ्र ही ‘मेधा बुद्धि’ की याचना कर रहा है। मात्र याचना से याचना की पूर्ति सम्भव नहीं है। उसके लिए स्वयं भी प्रयत्न आवश्यक है। इसी प्रयत्न की सफलता के लिये दैनिक यज्ञ किया जाता है।

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समस्त यज्ञ की क्रिया को आचरण में उतारने वाली मेधा बुद्धि है। हमारे देवगण और पितर इसका श्रवण करते थे, व्यवहार में भी आचरण की पवित्रता नष्ट नहीं होने देते थे। आचरण की मर्यादा के आगे राज्य प्राप्ति तक की इच्छा नहीं रखते थे। त्याग-तपस्या जीवन की साधना थी। प्रतिदिन यज्ञ करके इस साधना के स्थायित्व के लिए वे मेधा बुद्धि की याचना करते थे। इस मेधा बुद्धि के कारण यह भारतीय संस्कृति जगद्गुरु के सम्मान से सम्मानित थी।

प्रभु से प्रार्थना है कि हम सब को वह बुद्धि प्रदान करें जिससे सारा संसार पुनः यह कह उठे-वही वृद्ध भारत गुरु है हमारा।

भद्र प्राप्ति मन्त्र

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अब आगे क्रम प्राप्त मन्त्रों में ईश्वरस्तुतिप्रार्थनोपासना के आदि और अन्त के मन्त्रों से आहुति देने का विधान महर्षि दयानन्द ने किया है।

प्रश्न हो सकता है इन मन्त्रों का पाठ तो प्रारम्भ में ही हो चुका, पुनः इनका उच्चारण कर आहुति देने का विधान क्यों?

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विश्वानि दुरितानि सम्पूर्ण दुरित दूर हो तथा भद्र अर्थात् भदि कल्याणे सुखे के अनुसार इहलोक कल्याणकारी हो तथा परलोक अर्थात् अगला जन्म, अगला जीवन सुखदायक हो-मोक्षसुख का प्रापक हो, यह प्रथम मन्त्र की प्रार्थना थी, या संकल्प था। द्वितीय मन्त्र अर्थात् ईश्वरस्तुतिप्रार्थनोपासना का अन्तिम मन्त्र संकल्प की पूर्ति सुपथ पर चलने से संभव है, कुटिलता युक्त कर्मों को त्यागने से संभव है, उसके लिए भूयिष्ठां ते नम उक्ति विधेम बार-बार ईश भक्ति में संलग्न रहने से गृहीत संकल्प ईशकृपा से पूर्ण होगा, ऐसी अभिव्यक्ति यज्ञ आरम्भ करने से पूर्व की थी। आदि में उच्चरित भावों के स्मरणार्थ या परिपक्वता के लिए इन मन्त्रों की आहुतियों का विधान है। ये मन्त्र इस प्रकार है-

ओम् विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव। यद् भद्रं तन्न आसुव स्वाहा।                                                                  

-यजुर्वेद ०//

ओम् अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूमिष्ठां ते नम उक्तिं विधेम स्वाहा।

-यजुर्वेद //१६

दैनिक यज्ञ में गृहीत संकल्प तथा संकल्प पूर्त्यर्थ व्रत हमें अन्य कार्यों में संलग्न रहते हुये भी स्मरण रहना चाहिये, जिससे हमारा आचार विचार सदैव पवित्र बना रहे, इसके स्मरणार्थ अन्त में इन मन्त्रों से आहुति देने का अर्थात् पूर्ण समर्पण भाव से इनके पालनार्थ महर्षि ने पुनः अन्त में इनकी आहुतियों का विधान किया है।

इन मन्त्रों के विस्तृत अर्थों पर विचार ईश्वरस्तुतिप्रार्थनोपासना के मन्त्रों की व्याख्या के साथ कर चुके हैं।

अन्त में,

ओम सर्वं वै पूर्णं स्वाहा।

मंत्र को तीन बार बोलकर आहुतियाँ देने के साथ ही इस यज्ञ-कर्म की इति-श्री हो जाती है।

सर्वं ईश्वर को कहते हैं, जो सब तरह से पूर्ण है। न ईश्वर में कोई कमी है, न संसार रूपी उसकी कृति में। पूर्ण होने के कारण वह हर बार संसार को एक जैसा ही बनाता है। बदलाव की आवश्यकता ही वहाँ होती है, जहाँ अपूर्णता हो। हे ईश्वर! मैं भी अपने ज्ञान में व अपने कर्मों में आपकी तरह पूर्ण बन जाऊँ। समाधि में आपका आनंद लेते हुए तो मैं पूर्ण ही होता हूँ, समाधि से बाहर आने पर भी मैं ईश्वर-प्रणिधान के माध्यम से पूर्ण ही रहूँ। इन शब्दों को बोलते हुए इसी तरह का भाव मन में आना चाहिए।

अन्त में हम यही प्रार्थना करते है-

हे नाथ। सब सुखी हो, कोई हो दुखारी।

सब हो निरोग भगवन् धनधान्य के भण्डारी।।

सब भद्र भाव देखें, सन्मार्ग के पथिक हों।

दुखिया कोई होवे, सृष्टि में प्राणधारी।।