न्याय और दया क्या हैं?

 

‘दया’ शब्द का अर्थ माना जाता है-अपराधी को बिना दण्ड दिये छोड़ देना। ‘दया’ शब्द का यह अर्थ करना बिलकुल गलत है। जिसने जैसा, जितना बुरा कर्म किया हो उसको उतना, वैसी ही दण्ड देना ‘न्याय’ और अपराधी को दण्ड न देने से ‘दया’ का नाश हो जाता है। एक अपराधी को छोड़ देना, हज़ारों धर्मात्मा पुरुषों को दुख देने के समान है। जब एक अपराधी के छोड़ने से हज़ारों मनुष्यों को दुख प्राप्त होता है, तो ऐसा करने को ‘दया’ कैसे कहा जा सकता है? अपराधी को कैद कर व मार कर उसे पाप करने से बचाना अपराधी पर दया है। न्याय और दया में नाम मात्र का ही भेद है। मानसिक स्तर पर सबको सुख देने व दुख से छुड़ाने की इच्छा करना दया कहलाती है और बाह्य चेष्टा द्वारा यथायोग्य दण्ड देकर, यहीं कार्य करना, न्याय कहलाता है।

इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि दया शब्द का कोई स्वतंत्र अर्थ नहीं है। सत्यार्थ प्रकाश के सप्तम समुल्लास मे महर्षि दयानन्द जी ने लिखा है, “ईश्वर की दया पूरी यह है कि जिसने सब जीवों के प्रयोजन सिद्ध होने के सब पदार्थ जगत में उत्पन्न करके दान दे रखे हैं…. “

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