ध्यान अथवा उपासना की विधि
ईश्वर संसार की सर्वोत्तम वस्तु है। उसे प्राप्त करने की इच्छा के साथ उसके पास बैठना अर्थात् उसके विचारों में मग्न होने को ही उपासना कहा जाता है। जब हम भौतिक अग्नि, जो जड़ है, के पास बैठते हैं, तो उसकी गर्मी व प्रकाश समान दूरी पर समान ही होते हैं, परन्तु ईश्वर तो अग्नि के विपरीत चेतन है। उसके पास बैठने से उसका आनन्द सभी को एक समान नहीं मिलता। पात्रता अथवा योग्यता के अनुपात में ही व्यक्ति ईश्वरीय आनन्द प्राप्त कर पाता है।
जो व्यक्ति उपासना करना चाहे, उसे एकान्त स्थान में स्थिर होकर बैठना चाहिए। यहां, एकान्त स्थान से तात्पर्य उस स्थान से है, जहाँ शोर-गुल न हो व जहाँ सांसारिक बाधाएं न हों। स्थिर होकर बैठने का तात्पर्य केवल इतना है कि बैठने की ऐसी स्थिति हो, जिसमें अधिकतम समय तक सुखपूर्वक बैठा जा सके। यदि, शारीरिक स्थिति के कारण भूमि पर सुखपूर्वक न बैठा जा सके, तो उपासना काल में कुर्सी आदि पर भी बैठा जा सकता है। यदि, कुर्सी पर बैठना भी सम्भव न हो, तो लेटकर भी उपासना की जा सकती है। क्योंकि उपासना संसार की सर्वोत्तम वस्तु को प्राप्त करने के लिए की जाती है, इसलिए इसकी तैयारी अत्यन्त समय व निष्ठा मांगती है। उपासना काल के समीप या दूर की विभिन्न क्रियाएँ, वस्तुतः उपासना की तैयारियाँ ही हैं, परन्तु ऑंखें बन्द करके की जाने वाली सभी क्रियाओं को उपासना कह दिया जाता है। उपासना के लिए आवश्यक सबसे पहली तैयारी है- व्यक्ति का धार्मिक होना। धार्मिक होना अपने आप में ही बहुत जटिल है। धार्मिक होने के लिए आवश्यक है कि हम धर्म के वास्तविक स्वरूप को समझें व उस समझ के अनुरूप आचरण कर पाएँ, लेकिन ऐसा कर पाना सबके बस की बात नहीं। इसका यह अर्थ नहीं लेना चाहिए कि व्यक्ति धार्मिक हुए बिना उपासना कर ही नहीं सकता, परन्तु उसकी इच्छा तो धार्मिक बनने की होनी ही चाहिए। धार्मिकता का आरम्भ वह दूसरों के साथ प्रीति करके व द्वेष न करके कर सकता है।
दूसरी तैयारी– हमें दिन के चौबीसों घंटे अपने व्यवहार को यमों और नियमों के अनुरूप करना होता है। उदाहरण के लिए हम दूसरे यम सत्य को लेते है। हमारा व्यवहार सत्य के अनुरूप तभी हो सकता है, जब हम सत्य के वास्तविक स्वरूप को समझ जाएँ। उसके लिए हमें विद्वानों के अनेक कथनों को सुनना व पढ़ना पड़ता है। फिर अभ्यास के माध्यम से हमें तदनुसार आचरण करने की आदत डालनी होती है।
तीसरी तैयारी– ईश्वर को पाने की अपनी इच्छा को इतनी तीव्र करना कि वह व्याकुलता अथवा आतुरता में परिवर्तित हो जाए। यह आतुरता अथवा उत्सुकता उसी प्रकार की होनी चाहिए जैसी कि दिनभर विद्यालय पढ़ने वाला छात्र सांयकाल छुट्टी का समय निकट आते ही ख़ुशी से झूम उठता है। इस आतुरता को बढ़ाने के लिए हमें बार-बार (दिन में कईं बार) ईश्वर से होने वाले लाभों पर विचार करना चाहिए। ईश्वर के लाभ समझ आने पर हमारी उपासना में एकाग्रता स्वमेव बढ़ जाती है।
चौथी तैयारी– ईश्वर के लाभों की समझ को दो तरीकों से व्यवहार में लाया जाना चाहिए – एक, दिन के चौबीसों घंटे ईश्वर की विद्यमानता को अनुभव करना। जिस समय हम ईश्वर की विद्यमानता का ध्यान कर पाते हैं, उस समय हम पाप में प्रवृत नहीं हो पाते। दूसरा, उपासना का समय समीप आने पर मन का इस विचार से प्रफुल्लित हो जाना कि अब मेरे ध्यान का समय उपस्थित होने वाला है, जब मुझे इन सांसारिक झंझालों से मुक्ति मिल जाएगी और मैं ईश्वरीय आनन्द में गोते लगा पाऊँगा। ध्यान का समय आते ही हमें उसी प्रकार दिनभर के झंझटों को, सांसारिक बातों को, सांसारिक उलझनों को व सभी प्रकार की चिन्ताओं को भूल जाना चाहिए, जैसे, बच्चे छुट्टी का समय पास आने पर दिनभर की पढ़ाई की थकान को भूल जाते हैं। ऐसा करने पर ही हम उपासना में प्रगति कर सकते हैं।
पाँचवीं तैयारी– जहाँ तक हो सके, आरम्भ में हमें उपासना के लिए प्रतिदिन एक ही स्थान पर बैठना चाहिए। बैठने के पश्चात् हमें अपने मन के द्वारा यह महसूस करना चाहिए कि शरीर के सभी अंग ढीले अथवा आरामदायक स्थिति में हैं। इसके लिए आरम्भ में प्राणायाम के अतिरिक्त 10 लम्बे व गहरे साँस लें। सांसों को लेते समय हमारे शरीर पर अतिरिक्त दबाव कदापि नहीं पड़ना चाहिए। सांसों को रोकना नहीं है और साँस छोड़ते हुए पेट को अधिक संकुचित करके नहीं रखना है। लम्बे व गहरे साँस लेने प्रयोजन शरीर को अधिक से अधिक शिथिल करना और सकारात्मक विचार उठाने में सक्षम करना है।
छठी तैयारी– इस समय आपकी स्थिति नदी के किनारे खड़े हुए उस व्यक्ति जैसी होनी चाहिए, जो पानी में छलांग लगाने को बस तत्पर ही है। वह बाहर की गर्मी से परेशान है तथा एकदम पानी में कूद कर शान्ति एवं शीतलता प्राप्त करने को आतुर है। आप भी अपने आसन पर उपासना में इसी तत्परता से, इसी उत्कण्ठा से बैठें, अन्यमनस्क होकर ढीले-ढाले रूप में नहीं। अब आप किसी एक ईश्वर की स्तुति वाले भजन को पढ़ें अथवा गुनगुनाएँ। यदि आपके लिए यह अधिक उचित हो, तो ईश्वर की स्तुति वाले भजन को ऑंखें बन्द करने के पश्चात् मन में दोहरा सकते हैं। भजन का चुनाव हमारी व्यक्तिगत रुचि पर निर्भर करता है।
ऑंखें बन्द करने के पश्चात्-
पहला चरण– मन में निम्न वाक्यों को दोहराएँ-
1 हम आनन्द के अभिलाषी हैं और वह आनन्द केवल ईश्वर के पास ही है।
2 इस सृष्टि का स्वामी और नियामक एक ईश्वर ही है। जिन शरीरों, इन्द्रियों, बुद्धि आदि से हम आश्चर्यजनक काम कर पाते हैं, उनको बनाने वाला ईश्वर ही है।
3 ईश्वर न्यायकारी है। उसका प्रत्येक व्यवहार पक्षपातरहित ही होता है।
4 ईश्वर इस सृष्टि के कण-कण में व्याप्त है। वह हमारी आत्मा में ऐसे ओत-प्रोत हो रहा है, जैसे गीली रुई में पानी समाया हुआ होता है।
5 आत्मा की सत्ता के कारण ही यह जड़ शरीर देख, बोल और सोच पाता है। मेरा शरीर ‘मैं’ नहीं है।
6 मैं अपने मस्तिष्क में सुविचार ही लाऊँ, दूसरों का हित ही सोचूँ, भूतकाल की घटनाओं को सोचकर कभी दुखी न होऊं, मेरा कोई भी विचार मेरे क्लेश बढ़ाने वाला न हो, मैं दुष्विचारों को रोकने वाला होऊं, मेरी सभी इन्द्रियाँ मेरे नियन्त्रण में हों, ये आँखें वेदों, मोक्ष-शास्त्रों का पाठ करें, ये आँखें कभी धर्म-विरुद्ध और पाप-जनक पुस्तकों के पाठ अथवा पराई स्त्रियों के दर्शन में न लगें, इन के द्वारा मैं किसी पर क्रोध की दृष्टि न डालूँ, सदा प्रेम का भाव इनसे प्रकाशित हो, इन की सहायता से मैं अन्धों और यात्रियों को सीधे रास्ते पर डालूँ, मेरे कानों में सदा मधुर और पवित्र शब्द पड़ते रहें, गन्दे गीत और दुष्ट वचन कर्णगोचर होकर मेरी आत्मा के संस्कारों को भ्रष्ट न करें, मैं सदा मीठा ही बोलूँ, कड़वी व अपमानजनक भाषा का प्रयोग न करूँ, कभी भी किसी का उपहास न उड़ाऊं, तुच्छता और नीचता के अंकुर मेरी हृदय-भूमि में कभी उत्पन्न न होवें, मेरा हृदय प्रत्येक स्थिति में विशाल रहे, मैं दूसरों की सहायता करने वाला होऊं, मैं ईश्वर द्वारा बनाई चीजों के माध्यम से सदैव दूसरों के लिए हितकारक वस्तुओं को ही बनाऊं, मैं उत्तम संतानों का निर्माण करूँ, मैं हर धर्म-विरुद्ध कार्य का विरोध करने वाला होऊं, मैं हर उत्तम कार्य की प्रशंसा, सहयोग और बढ़ावा देने वाला होऊं, मेरी प्रत्येक गति धर्म की राह पर ही हो और मेरा मन आपके सत्यस्वरूप को जानने वाला हो।
7 केवल ईश्वर ही हमारा सच्चा, सब जगह और सब समय उपलब्ध रहने वाला मित्र हो सकता है। मुझे उस सर्वशक्तिमान ईश्वर की मित्रता के योग्य बनना है।
8 मेरा मन स्थिर और प्रसन्न है। इस वाक्य को उपासना काल के अतिरिक्त भी दिन में कईं बार दोहराएँ।
ये वाक्य तोते की तरह नहीं, अपितु आप के हृदय से निकलने चाहिएं। इनमें एक आत्मीयता, एक प्रेम, एक आतुरता, एक कृतज्ञता होनी चाहिए। भाषा तथा शब्द कोई भी हो सकते हैं, भाव यही होने चाहिएं। ऊपर कही बातों को अक्षरशः दोहरानें की जरूरत नहीं है, बल्कि इन बातों को साररूप में दोहराना ही पर्याप्त है।
ऑंखें बन्द करने के पश्चात् उपर्युक्त सुझाई सभी क्रियाएँ 2-3 मिनट में हो जानी चाहिएँ।
बहुत से लोग ऐसा मानते हैं कि उपासना अथवा ईश्वर के ध्यान के दौरान हमें केवल अपनी सांसों को अधिक से अधिक महसूस करना होता है और अपने मन के विचारों को एक द्रष्टा की भांति केवल देखना होता है। मन के विचारों को एक द्रष्टा की भांति देखने से हमारे अन्दर एक सामर्थ्य उत्पन्न होता है, जिससे हम भविष्य में अपने मन के विचारों को नियन्त्रित कर पाते हैं। हो सकता है मन के विचारों को नियन्त्रित करने के सामर्थ्य की बात कुछ हद तक ठीक भी हो, परन्तु उपासना करने की इस विधि से लाभ बहुत ही कम व बहुत समय बाद मिलता है। और तो और उपासना करने की यह विधि किसी ऋषि द्वारा अनुमोदित भी नहीं की गई है। जो उपासना की विधि नीचे बताई जा रही है, वह महर्षि पतञ्जलि के ‘योग दर्शन’ पर आधारित है।
दूसरा चरण– उपर्युक्त बातों को मन में दोहराने के पश्चात् पिछली उपासना से अबतक के अपने यम-नियम के विरुद्ध किए व्यवहारों को अपने मानसिक पटल पर लाएँ और संकल्पित हों कि ये गलतियाँ हम दोबारा नहीं दोहराएँगे। हो सकता है, प्रारम्भ में 25-30 मिनट का उपासना का समय अबतक की क्रियाओं में ही समाप्त हो जाए, परन्तु इसे निराशा की बात न मानें। जैसे जैसे हमारा व्यवहार यम-नियमों के अनुरूप होता जाता है, वैसे वैसे यम-नियम के विरोधी अपने व्यवहारों को जाँचने में 1-2 मिनट ही पर्याप्त होते हैं।
तीसरा चरण– यम-नियमों को विचारने के बाद प्राणायाम, प्रत्याहार और शरीर के किसी एक स्थान पर धारणा करें। 5 से 10 मिनट का समय प्राणायाम के लिए पर्याप्त होता है। प्राणायाम करने से पहले उसके नियमों को व प्राणायाम की विधि को अच्छी तरह समझ लें। प्राणायाम के दौरान हमें अपने मन को खाली न रखते हुए ईश्वर के चिन्तन में लगाना होता है। अगले चरणों में जब ईश्वर का चिन्तन किया जाता है, तो उस स्थिति में हमारी सभी इन्द्रियाँ अपने विषयों को उतने समय तक छोड़ देती हैं अर्थात् ईश्वर के चिन्तन के साथ साथ हमारा प्रत्याहार भी सिद्ध हो जाता है। धारणा के अन्तर्गत हमें अपने मन को शरीर के किसी भाग पर स्थिर करना होता है मन, जड़ होने के कारण अपनेआप उस स्थान से नहीं हिल सकता। जब भी वह हमारे विचारों के कारण अपने स्थल से हिले, तो हमें तुरन्त उसे वापिस धारणा-स्थल पर लाना होता है। कुछ विद्वानों के अनुसार ईश्वर का सतत् चिन्तन करने से मन अपनेआप एक स्थान पर स्थिर हो जाता है अर्थात् धारणा की सिद्धि हो जाती है।
चौथा चरण– ईश्वर के निज् नाम ओम् का व उसके किसी गुण-वाचक विशेषण का अपने मन में जाप करें। मानसिक जप ओम् के स्थान पर किसी अन्य मन्त्र का भी किया जा सकता है। गायत्री मंत्र में अच्छी लय बन जाती है। अन्य मंत्र भी इसके स्थान पर लिये जा सकते हैं। यह जाप इतनी तन्मयता से होना चाहिए कि आप स्वयं भी इसी में लीन हो जाएं। बाहर की तो क्या, यहाँ तक कि अपनी सुध-बुध भी बिल्कुल भूल जाएं । जाप में शब्द, उसका अर्थ और उसके साथ जुड़ी भावना सम्मिलित होती है। जाप मात्र किसी शब्द को दोहराने का नाम नहीं है। जाप में प्रयुक्त शब्द का अर्थ भी मन में उसी समय आना चाहिए। जाप में प्रयुक्त शब्द से जुड़ी भावना भी उसी समय मन में आनी चाहिए जैसे, ओम् शब्द का जाप करते ही ईश्वर नामक सत्ता का, जिसका यह नाम है, ध्यान आना चाहिए। क्योंकि ईश्वर के साथ आनन्द की भावना जुड़ी हुई है, इसलिए ओम् शब्द बोलते ही हमारा मन आनन्द अर्थात् प्रसन्नता से भर जाना चाहिए। जप के जरिए हमें ईश्वर के आनन्द में मग्न होने का प्रयास करना चाहिए। जब भी हमारा मन जप के स्थान पर किसी अन्य विषय के चिन्तन में लग जाए, हमें तुरन्त उसे वहाँ से रोककर पुनः जाप में लगा देना चाहिए। यदि, मन बहुत अधिक चंचल हो रहा हो और बार बार सांसारिक विषयों में ही भागता जा रहा हो, तो उसे साँस की प्रक्रिया पर केन्द्रित कर दें और निरीक्षण करना प्रारम्भ करें कि नाक से श्वास लिया जाकर शरीर में कितनी दूर तक प्रविष्ट हो रहा है तथा शरीर के अन्दर वह किस-किस स्थान का स्पर्श कर रहा है। इसी प्रकार नासिका से निकलने पर वह बाहर कितनी दूर तक जा रहा है तथा किस गति से जा रहा है आदि आदि। दूसरा उपाय यह है कि हम ईश्वर से वार्तालाप प्रारम्भ कर दें।
पाँचवां चरण– प्रारम्भ में हमारा मन लगातार अधिक समय तक ईश्वर के नाम अथवा उसके किसी गुण-वाचक विशेषण का जप नहीं कर पाता। इसलिए, ईश्वर के नाम के जाप के 5-7 मिनट बाद हम अपने मन को ईश्वर के कार्यों व गुणों के चिन्तन में लगा देते हैं। उसकी सर्वज्ञता, दयालुता, सर्वव्यापकता का न केवल विचार ही करें, अपितु ऐसा अनुभव करने का भी यत्न करें। अपने मन में इस प्रकार के भाव भरें कि मैं आनन्द सागर प्रभु के बीच में बैठा हुआ हूँ। वह प्रभु यहाँ वहाँ सर्वज्ञ प्रत्येक अणु-परमाणु में व्याप रहा है। यहाँ, स्वाध्याय की महत्ता सामने आती है। जितना अधिक हमारा स्वाध्याय होगा, उतना ही अच्छा हमारा ईश्वर-चिन्तन होगा। 2-3 मिनट के ईश्वर के कार्यों व गुणों के चिन्तन के बाद हमें पुनः ओम् व ईश्वर के किसी गुण-वाचक विशेषण का जाप शुरु कर देना चाहिए। 30 मिनट के उपासना के समय में हम कुछ सैकण्ड ही ईश्वर के आनन्द में मग्न हो पाते हैं।
ये सभी क्रियाएं 30 मिनट के उपासना-काल के हिसाब से सुझाई गईं हैं। जो साधक 30 मिनट से अधिक समय उपासना करना चाहते हैं, वे अतिरिक्त समय में, हर 5-7 मिनट के ओम् या गायत्री मन्त्र के जाप के पश्चात् संध्या में महर्षि दयानन्द द्वारा इकट्ठे किए मन्त्रों व ऋषि वचनों के अर्थों को विचारें।
उपासना करने के पश्चात् ऑंखें बन्द किए ही निम्न प्रार्थना को मन में दोहराएँ।
“हे ईश्वर! मैं पूरी ईमानदारी से आपको अपने हृदय में वसने के लिए आमन्त्रित करता हूँ। आप मेरी बुद्धि को अपने आनन्दमय स्वरुप को अनुभव कर पाने के लिए प्रेरित कीजिए।”
हममें ईश्वर को प्राप्त करने की इस यात्रा में अपनी प्रगति की स्थिति को जानने की इच्छा बहुत स्वाभाविक है। हमारे में सांसारिक वस्तुओं को भोगने की इच्छा जितनी कम होती जाती है, हम इस यात्रा में अपनी उतनी प्रगति मान सकते हैं।
ईश्वर के आनन्द को प्राप्त करना मनुष्य का अन्तिम लक्ष्य है और इस लक्ष्य को प्राप्त करने में उपासना एक महत्त्वपूर्ण स्तम्भ है। एक साधारण व्यक्ति को उपासना में अच्छी स्थिति प्राप्त करने में दशकों का समय लग सकता है। परन्तु, यह भी सत्य है कि हमारा स्वाध्याय, हमारा चिन्तन जितना अधिक विस्तृत होगा और हमारा व्यवहार जितना अधिक हमारे स्वाध्याय के अनुरूप होगा, उतनी ही शीघ्रता से हमारी उपासना में प्रगति होगी। ईश्वर-प्रणिधान से हमारा अपने अन्तिम ध्येय को पाना और भी सुगम हो जाता है।
ध्यान की प्रक्रिया को इस प्रकार समझें कि जैसे प्रारम्भ में एक बच्चे को अक्षराभ्यास कराने में पर्याप्त परिश्रम तथा कठिनाई होती है। बाद में वह स्वयं ही पढ़ने लगता है। स्कूटर आदि वाहन सीखते समय नये चालक की भी यही अवस्था होती है। बाद में, वह बातें करता, चलता हुआ भी वाहन को भली-भांति चलाता जाता है। यही अवस्था मन की है। प्रारम्भिक दिनों में मन भी बहुत उत्पात मचायेगा, सरल रास्ता छोड़ कर कुपथ पर भी भागेगा। इससे घबराने की आवश्यकता नहीं। कुछ दिनों के अभ्यास से वह आज्ञाकारी बन जायेगा। यह साधक के प्रयत्न पर निर्भर करता है कि यह मन कितने समय में काबू में आए।