हवन के मंत्र व उनके अर्थ
देव-यज्ञ के आरम्भ में आठ ईश्वरस्तुतिप्रार्थनोपासना के मंत्रों को पढ़ने का विधान है। इन मंत्रों के अर्थ नीचे दिए हैं।
ईश्वरस्तुतिप्रार्थनोपासना के मंत्रों के अर्थ
(यहाँ शीर्षक में स्तुति, प्रार्थना और उपासना का क्रम व्याकरण की दृष्टि से है- स्तुति शब्द में दो स्वर, प्रार्थना शब्द में तीन स्वर और उपासना शब्द में चार स्वर होते हैं। वास्तव में प्रार्थना उपासना के बाद ही फलीभूत हो सकती है। गायत्री मन्त्र में स्तुति, प्रार्थना और उपासना तीनों का समावेश है और यहाँ इस मन्त्र में प्रार्थना पद उपासना पद के बाद ही आता है।)
मंत्र
ओ३म। विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव। यद भद्रं तन्न आ सुव।।
अर्थ– हे (सवितः) सकल जगत् के उत्पत्तिकर्त्ता, समग्र ऐश्वर्ययुक्त (देव) शुद्धस्वरूप, सब सुखों के दाता परमेश्वर! आप कृपा करके (नः) हमारे (विश्वानि) सम्पूर्ण (दुरितानि) दुर्गुण, दुर्व्यसन और दुखों को (परा सुव) दूर कर दीजिये। और (यत्) जो (भद्रम्) कल्याणकारक गुण, कर्म, स्वभाव और पदार्थ हैं, (तत्) वह सब हमको (आ सुव) प्राप्त कीजिये।
मंत्र
हिरण्यगर्भः समवर्त्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत।
स दाधार पृथ्वीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम।।
अर्थ– जो (हिरण्यगर्भः) स्वप्रकाशस्वरूप और जिसने प्रकाश करने हारे सूर्य-चन्द्रमादि पदार्थ उत्पन्न करके धारण किये हैं, और जो (भूतस्य) उत्पन्न हुए सम्पूर्ण जगत् का (जातः) प्रसिद्ध (पति) स्वामी (एकः) एक ही चेतनस्वरूप (आसीत्) था, जो (अग्रे) सब जगत के उत्पन्न होने से पूर्व (समवर्त्तत) वर्त्तमान था, (सः) वह (इमाम) इस (पृथिवीम्) भूमि (उत) और (द्याम्) सूर्यादि को (दाधार) धारण कर रहा है, हम लोग उस (कस्मै) सुखस्वरूप (देवाय) शुद्ध परमात्मा के लिए (हविषा) ग्रहण करने योग्य योगाभ्यास और अतिप्रेम से (विधेम) विशेष भक्ति किया करें।
सूर्यचन्द्रमादि पदार्थों को उत्पन्न करके धारण करने के कारण ईश्वर को हिरण्यगर्भः कहा जाता है।
मंत्र
य आत्मदा बलदा यस्य विश्व उपासते प्रशिषं यस्य देवाः।
यस्य छायाsमृतं यस्य मृत्युः कस्मै देवाय हविषा विधेम।।
अर्थ– (यः) जो (आत्मदाः) आत्मज्ञान का दाता, (बलदाः) शरीर, आत्मा और समाज के बल का देने हारा, (यस्य) जिसकी (विश्वे) सब (देवाः) विद्वान् लोग (उपासते) उपासना करते हैं, और (यस्य) जिसका (प्रशिषम्) प्रत्यक्ष सत्यस्वरूप शासन, न्याय, अर्थात शिक्षा को मानते हैं, (यस्य) जिसका (छाया) आश्रय ही (अमृतम्) मोक्षसुखदायक है, (यस्य) जिसका न मानना अर्थात् भक्ति न करना ही (मृत्युः) मृत्यु आदि दुख का हेतु है, हम लोग उस (कस्मै) सुखस्वरूप (देवाय) सकल ज्ञान के देनेहारे परमात्मा की प्राप्ति के लिए (हविषा) आत्मा और अन्तःकरण से (विधेम) भक्ति अर्थात उसी की आज्ञा पालन करने में तत्पर रहें।
यह स्वामी दयानन्द का ऋषित्व ही है कि उन्होंने आत्मदाः शब्द का, जिसका साधरणतया आत्मा को उत्पन्न करने वाला ही अर्थ निकलता है, ‘आत्मज्ञान का दाता’ अर्थ किया है। ‘आत्मज्ञान का दाता’ के दो अर्थ सम्भव हैं। एक- ईश्वरीय व्यवस्था से ही, शरीर मिलने के बाद ही, आत्मा को अपने होने का आभास हो पाता है। दूसरा- आत्मा की अपने स्वरूप को जानने की पात्रता का निश्चय ईश्वर ही करता है। परन्तु, यहाँ पहला अर्थ अधिक सटीक है।
मंत्र
यः प्राणतो निमिषतो महित्वैक इद्राजा जगतो बभूव।
य ईशे अस्य द्विपदश्चतुष्पदः कस्मै देवाय हविषा विधेम।।
अर्थ– (यः) जो (प्राणतः) प्राण वाले, और (निमिषतः) अप्राणिरूप (जगतः) जगत का (महित्वा) अपनी अनन्त महिमा से (एक इत्) एक ही (राजा) विराजमान राजा (बभूव) है, (यः) जो (अस्य) इस (द्विपदः) मनुष्यादि और (चतुष्पदः) गौ आदि प्राणियों के शरीर की (ईशे) रचना करता है, हम लोग उस (कस्मै) सुखस्वरूप (देवाय) सकल ऐश्वर्य के देने हारे परमात्मा के लिए (हविषा) अपनी सकल उत्तम सामग्री से (विधेम) विशेष भक्ति करें।
मंत्र
येन द्यौरुग्रा पृथिवी च दृढा येन स्वः स्तभितं येन नाकः।
यो अन्तरिक्षे रजसो विमानः कस्मै देवाय हविषा विधेम।।
अर्थ– (येन) जिस परमात्मा ने (उग्रा) तीक्ष्ण स्वभाव वाले (द्यौः) सूर्य आदि, (च) और (पृथिवी) भूमि को (दृढ़ा) धारण किया है, (येन) जिस जगदीश्वर ने (स्वः) सुख को (स्तभितम्) धारण, और (येन) जिस ईश्वर ने, (नाकः) दुखरहित मोक्ष को धारण किया है, (यः) जो (अन्तरिक्षे) आकाश में (रजसः) सब लोक लोकान्तरों को (विमानः) विशेष मानयुक्त, अर्थात् जैसे आकाश में पक्षी उड़ते हैं, वैसे सब लोकों का निर्माण करता है और भ्रमण कराता है, हम लोग उस (कस्मै) सुखदायक (देवाय) कामना करने के योग्य परब्र