हमें उपासना करने की क्या आवश्यकता है?
उपासना ईश्वर के पास बैठने को कहते हैं। हम कुछ भी बिना किसी मतलब के नहीं करते, चाहे वो ड्रॉइंग रूम से किचन तक जाना ही क्यों न हो। ऐसे में, यदि हमें ईश्वर के पास बैठने की आवश्यकता को समझना है, तो हमें उससे होने वाले लाभों के बारे में जानना होगा। ईश्वर के लाभों को समझने से पहले हमें यह निश्चयपूर्वक अपने मन में बिठा लेना होगा कि हमारे शरीर, बुद्धि, इन्द्रियों व संसार की विभिन्न वस्तुएं, जिन पर हमारा जीवन आधारित है, ईश्वर द्वारा निर्मित हैं और ईश्वर के इस योगदान को स्वीकार करने से हमारे अन्दर ईश्वर के प्रति कृतज्ञता के भाव उत्पन्न होते हैं व हम ईश्वर के अन्य लाभों को समझ पाने में समर्थ हो पाते हैं।
- बड़े बड़े डाक्टर, इंजीनियर, साइंसटिस्ट आदि अपना काम ईश्वर को बगैर माने भी अच्छे से चला पाते हैं, तो ऐसे में एक प्रश्न हमारे मन में आना स्वाभाविक है कि आखिरकार ईश्वर को मानने की आवश्यकता ही क्या है। यह एक तथ्य है कि हम कितना भी किसी कार्य को करने में दक्ष क्यों न हो जाएं, उस कार्य की पूर्णता का आभास हमें तभी होता है, जब हम ईश्वर के सही स्वरूप को समझ लेते हैं। शायद अभी यह बात आपको गलत लग रही हो, परन्तु इस निबंध के अंत तक आपको यह बात समझ आने लगेगी कि ईश्वर को मानने के पश्चात् हमारे अपने कार्य के प्रति दृष्टिकोण में अमूल-चूल परिवर्तन आ जाता है, जो सीधे हमारी उस कार्य को करने की दक्षता को प्रभावित करता है।
- हम सभी की एक मूलभूत आवश्यकता है कि हम सदा सुखी रहना चाहते हैं। हमारे सुख का धर्म ही एकमात्र मूल है। ईश्वर की ओर बढ़ने से हम धर्म-अधर्म से अवगत होने लगते हैं। धर्मानुसार कार्य करने पर हमें निश्चित रूप से सुख मिलता है और इसके विपरीत अधर्म का आचरण करने से हम निश्चित रूप से ईश्वर की ओर से दुख पाते हैं। दूसरे लोग भी हमें दुख देने में स्वतंत्र हैं। ईश्वर उन्हें रोक नहीं सकता, परन्तु उनके अन्याय से हमें दुख देने पर उन दुखों की भरपाई अवश्य करता है। नैतिकता धर्म का ही एक अंश है। ईश्वर को मानने से नैतिकता का आदान हममें स्वतः हो जाता है।
- क्योंकि, प्रसन्नता हमें सुख देती है, इसलिए हम सदा प्रसन्न रहना चाहते हैं। परन्तु, सांसारिक व्यवहारों के मध्य हमारा सदा प्रसन्न रह पाना असम्भव होता है। ऐसे में, यह जानना कि ईश्वर को सही-सही मानना हमें प्रसन्न रखता है, अत्यन्त सुखप्रद है। आइए, इसे हम एक उदाहरण के माध्यम से समझते हैं। जैसे, हमारे देखने के सुख में तभी पूर्णता आती है, जब हमारे मन में स्वस्थ आंख और प्रकाश देने वाले के प्रति कृतज्ञता का भाव हो। उसी तरह प्रसन्नतारूपी संतोष को प्राप्त करने के लिए आवश्यक है कि हममें ईश्वर के प्रति कृतज्ञता का भाव हो। वैसे भी, किसी बात को समझ लेने पर हमें आंतरिक सुख की अनुभूति होती है और उस समझे हुए ज्ञान को आचरण में लाने से हमें और अधिक सुख मिलता है। इस बात का प्रत्यक्ष हम संसार में करते ही रहते हैं।
- एक आम धारणा है कि अपने दायित्वों को पूर्ण निष्ठा से निभाने में ईश्वर को मानने की कोई आवश्यकता नहीं। यह धारणा पूर्ण रूप से गलत है। ये तो सभी मानते हैं कि पॉजिटिव गुणों के बगैर हम अपने सांसारिक दायित्वों को भी नहीं निभा सकते। ऐसे में ईश्वर, जिसमें पॉजिटिव गुणों की पूर्णता समाहित है, को जाने बगैर अपने सांसारिक दायित्वों को पूर्णता से निभा पाना असम्भव है।
- हमारे शोक, चिन्ता आदि का मुख्य कारण भय है। ईश्वर ने हमारे शरीर की रचना ही कुछ इस तरह की है कि किसी तरह की हानि की आशंका से हम भयभीत हो जाते हैं और उस भय को दूर करने के लिए व्यर्थ की चिंताएं करते है और हम अपनी बहुत सारी ऊर्जा व्यर्थ की चिंताएं करने और भय को दूर करने में व्यय कर देते हैं। ईश्वर ने हमारे शरीर में ऐसी व्यवस्था कर रखी है कि हम अपने भय से कुछ ही देर लड़ सकते हैं; लड़ने का हमारा सामर्थ्य असीम नहीं होता। यह सामर्थ्य हमारा लड़ने के साथ-साथ क्षीण होता जाता है और यदि, भय की स्थिति बार-बार, अर्थात दिन में कईं बार आती है, तो हमारे भय से लड़ने के सामर्थ्य का ह्रास बहुत शीघ्र हो जाता है। इस स्थिति से निपटने का एकमात्र समाधान है कि हम निर्भय बनें। निर्भयता हमारे शारीरिक, मानसिक व आत्मिक स्वास्थ्य के लिए रामबाण औषधि है। अपने में निर्भयता लाने का एकमात्र साधन उपासना है।
- उपासना से हमारे दुखों के मूल में विद्यमान अविद्यादि क्लेश मिटते हैं और हममें मोह, द्वेष, लोभ और क्रोध का सही स्वरूप सामने आता है, जिन्हें अपने आचरण में लाकर हम उन्नति के शिखर पर पहुंच सकते हैं।
- ईश्वर के सच्चे स्वरूप में श्रद्धा और विश्वास बढ़ाने से मनुष्य की दुख, पीड़ा, बन्धन, भय, शोक, चिन्ताओं आदि का स्वयमेव नाश हो जाता है। ऋषि लोगों के अनुसार भगवत्प्रेम में हमारी बुराइयों को नाश करने की शक्ति है। हमारी बुरी आदतें कितनी भी क्यों न पक गईं हों, उपासना में बैठकर प्रेमपूर्वक ईश्वर से प्रार्थना करने पर उनको आसानी से बदला जा सकता है। मुश्किल यह है कि उपासना में बैठने पर हम पूरी ईमानदारी से भगवत्प्रेम को जगाने का प्रयत्न ही नहीं करते।
- ईश्वर को अनुभूत करने से पहले हमें अपनी आत्मा को अनुभूत करना होता है। उपासना करने से हम अपने आप को शरीर से भिन्न समझने लगते हैं। जो मनुष्य अपने आप को शरीर से भिन्न आत्मा नहीं मानता, उसके विचार शरीर से परे जा ही नहीं पाते। उपासना करने वाले को मृत्यु डरा नहीं पाती, क्योंकि ऐसा व्यक्ति ईश्वर के न्यायकारी स्वरूप को जानने से अपने व अपने सगे-सम्बन्धियों के शरीर नष्ट होने में किसी तरह की कोई हानि नहीं देखता।
- हमें समझ आ जाता है कि हमारे जीवन का अंतिम उद्देश्य वही हो सकता है, जिसको पाने के बाद और कुछ पाने की इच्छा न रहे और ऐसा मोक्ष प्राप्ति पर ही सम्भव है।
- उपासना से हमारे आत्मिक बल में इतनी वृद्धि होती है कि पहाड़ के समान विपत्ति आने पर भी हम भयभीत नहीं होते।
उपासना करने में उसी का मन लगता है, जिसने ईश्वर को पाने के लाभों को आत्मसात कर लिया है। जब हम इस बात को हृदय से स्वीकार कर लेते है कि ईश्वर हमारा सर्वोच्च सखा है और वह हर समय, हर जगह पर और हर परिस्थिति में हमारा साथ निभाता है, तो ईश्वर को पाने के रास्ते में हमारी प्रगति बड़ी तीव्रता से होती है।
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