सनातन धर्म और आर्य समाज

सृष्टि उत्पत्ति से महाभारत के युद्ध के लगभग 1000 वर्ष पहले तक इस भूखण्ड के लोग वेद के अनुसार व्यवहार करते थे। वेद में जो करने योग्य और न करने योग्य कर्म सुझाए गए हैं, वे सभी कालों में और सभी परिस्थितियों में एक जैसे रहते हैं, जैसे, किसी को किसी से अन्याय नहीं करना चाहिए आदि। क्योंकि, ये सनातन नियम यहां के लोगों के वयवहारों में शामिल थे, इसलिए, यहां के लोगों को सनातन धर्मी कहा जाने लगा और उनके व्यवहारों को सनातन धर्म।

आज हमारी संस्कृति विनाश के कगार पर है। सीमाओं की रक्षा के लिए तो हमारे सैनिक तैनात हैं, परन्तु हमारी संस्कृति की रक्षा के लिए दयानन्द के शिष्य आवश्यक हैं। केवल दयानन्द के शिष्य ही हमारी विशिष्ट संस्कृति पर उठाए जाने वाले प्रश्नों का सही उत्तर देकर उनके मुँह बन्द कर सकते हैं। आर्य समाज रूपी संस्था सनातन धर्म के वास्तविक स्वरूप को जानने के लिए हमें दयानन्द की दृष्टि प्रदान करती है।