मिल कर चलने का अर्थ    

                                                                                                                                                     – नरेन्द्र आहूजा ‘विवेक’                                                        

संगच्छध्वं.- वेद भगवान ने इस संगठन सूक्त से आदेश दिया ‘मिलकर चलो’ अब प्रश्न उठता है कि मिलकर कैसे चलें क्या आकाश में उड़ रही ग़िद्धों एवं चीलों की भाँति किसी मरे हुए जानवर का भक्षण करने के लिए एक स्थान पर इक्ट्ठे हो जाने  को ही ‘मिल कर चलना’ कहेंगे। शायद नहीं, क्योंकि बुद्धिहीन प्राणियों द्वारा अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए मिलना या झुंड बनाना ‘समज’ कहलाता है, ‘समाज’ नहीं। मनुष्य तो एक सामाजिक प्राणी है और उसके लिए मिलकर चलने के लिए बुद्धिपूर्वक सोचविचार कर बनाई गई योजना से बना संगठन या समाज आवश्यक है। मननशील या विचारवान होना मनुष्य होने का प्रथम आवश्यक गुण है। अतः ‘संगच्छध्वं’ मिल कर चलने के लिए प्रथम आवश्यकता है कि मनुष्य विचार करते हुए योजना बनाकर श्रेष्ठ लोगों के समान अर्थात् समाज का गठन करके मिल कर चले।

अब दूसरा प्रश्न उठता है कि ‘मिल कर चलना’ किधर है, इसके लिए हमें अपने अर्थात् मनुष्य जीवन के उद्देश्य  को समझना होगा। क्या मनुष्य के जीवन का उद्देश्य शरीर के सुख के साधन एकत्रित करना है। यदि हम केवल ऐसा ही समझते है, तो शायद हमारी स्थिति ‘साधन आधीन’ वाली है, जोकि ‘पराधीन’ से भी बदतर है, और जीवन यात्रा में दुर्घटना को अवश्यंभावी बना देती है। यह ठीक है कि साधक द्वारा साधना के लिए साधन का ठीक होना साध्य अर्थात उद्देश्य  की प्राप्ति के लिए अत्यंत आवश्यक है। हम इस साध्य अर्थात् उद्देश्य प्राप्ति के लिए साधन एकत्रित करने के लिए क्या करें। तो इस प्रश्न  का उत्तर यजुर्वेद के चालीसवें अध्याय के प्रथम मंत्र में मिलता है- ‘तेन त्यक्तेन भुंजीथा’ अर्थात् समस्त ऐश्वर्य प्रदान करने वाले परमपिता परमेश्वर द्वारा प्रदत्त प्रकृति के साधनों का त्यागपूर्वक भोग वा उपयोग करें ।

लेकिन इन साधनों को पाकर भी चलने की दिशा का प्रश्न अनुत्तरित रह जाता है, इसके लिए हमें अपने लक्ष्य वा उद्देश्य को समझना होगा।  

 

सूर्य के अनुसरण का अर्थ  

                                     -महात्मा आनन्द स्वामी                   

सूर्य के पीछे चलना है तो अपने कर्तव्य के पालन में किसी भी समय एक क्षण के लिए प्रमाद न करो।

कुछ भी हो जाय अपने कर्तव्य को पूरा करो, अपने कर्तव्य से हटो नहीं, भागो नहीं।

सूर्य का दूसरा गुण है- चमक। हर समय, हर क्षण वह चमकता हुआ दिखाई देता है। तुम यदि सूर्य के पीछे चलना चाहते हो, तो तुम भी चमको। परन्तु कैसे चमको। मुँह पर तेल मलके, चेहरे पर सुर्खी और पाउडर लगाकर? नहीं। चमक को अपने अंदर से पैदा करो।

सूर्य का तीसरा गुण है- आकर्षण। सबको अपनी ओर खींचे रखना। तुम भी इस गुण को धारण करो, मेरे भाई! तुम्हारे बेटे, बेटियाँ, भाई, बहन, माता, पिता, सम्बन्धी, मित्र और सभी लोग जो तुम्हारे निकट हैं, तुम्हारे अन्दर आकर्षण-शक्ति अनुभव करें, तुम्हारे पास आना चाहें, तुम्हारे पास रहना चाहें- ऐसा स्वभाव बनाओ अपना। सूर्य में यदि यह आकर्षण- शक्ति न हो, यदि थोड़ी देर के लिए भी यह समाप्त हो जाय, तो यह सारा सूर्य-मण्डल नष्ट-भ्रष्ट हो जाएगा।

सूर्य का चौथा गुण है यह कि वह अपनी कीली (धुरी) से कभी इधर-उधर नहीं होता। दो अरब वर्ष पहले जहाँ खड़ा था, वहीं अब भी विद्यमान है। वहीं अपने केन्द्र पर घूमता है। यदि वह कहे कि एक ही जगह, एक ही केन्द्र पर घूमता हुआ तो मैं बोर हो गया, थोड़ी देर के लिए पचास-साठ हजार मील पृथिवी की ओर बढ़ जाता हूँ। तो इस धरती पर सबका भुर्ता बन जाएगा। यह बात सूर्य से सीखो, मेरे भाई! तुम मानव हो, मानवता तुम्हारा केन्द्र है।

यह है सूर्य के पीछे चलने, सूर्य के अनुसार अपने जीवन को बनाने का अर्थ।

                 आर्य भारत में बाहर से आए?

-डाक्टर बिजेन्द्रपाल सिंह

 आर्य भारत में बाहर से आए कुछ स्वार्थी तत्वों की चाल थी, यदि बाहर से यहां आते, तो वहां के नील, यूफ्रेट्रस आदि नदियों, स्थानों के नाम उनकी संस्कृति के साथ जुड़े होते, अपितु विदेशों में भारतीय शासकों के नामों का उल्लेख मिलता है, शिलालेख मिलते हैं, मूर्तियां व उनके बनाए स्थान आदि हैं, पूरे तथ्य इसके मिलते हैं कि भारत से आर्य संस्कृति बाहर गई। भारतीयों का विश्व भर में शासन व आधिपत्य रहा था। विषय अत्यन्त विस्तृत है- देश विदेश की इतिहास पुस्तकों, शिलालेखों आदि में, पुराणों आदि में इसका वर्णन मिलता है। आज की पाठ्य पुस्तकों में इस विषय को संशोधित कर लिखना व पढ़ाना चाहिए कि आर्य भारत के आदि काल से निवासी हैं, आर्य संस्कृति यहाँ से पृथ्वी पर गई तथा विश्व भर में भारतीयों का आधिपत्य रहा।

 

मनुष्य धर्म

-मनमोहन कुमार आर्य

वैज्ञानिकों का ईश्वर को न मानना कुछ इस प्रकार का है कि जैसे कोई विद्वान किसी पुत्र का अस्तित्व तो स्वीकार करे, परन्तु पिता के उपस्थित न होने पर पिता के अस्तित्व से इन्कार करे। वैज्ञानिक सृष्टि को तो स्वीकार करते हैं, परन्तु इस सृष्टि के रचयिता को अस्वीकार कर दते हैं। उनका यह कथन अवैज्ञानिक ही कहा जा सकता है। सृष्टि है तो सृष्टिकर्त्ता अवश्य है, उसी प्रकार से, जिस प्रकार से पुत्र है, तो उसके माता-पिता अवश्य ही हैं।

       संगठन वृद्धि के उपाय

-स्वामी देवव्रत सरस्वती

ऋग्वेद का अन्तिम सूक्त ‘संगठन सूक्त’ के नाम से प्रसिद्ध है जिसमें संगठन कैसे हो, इस पर बहुत गम्भीरता से विचार किया है।

१.     समान उद्देश्यसमानी आकूतिः तुम्हारा संकल्प, निश्चय और भावना एक समान हो। संगठन तभी आगे बढ़ता है जब उसके सभी कार्यकर्त्ताओं का उद्देश्य, लक्ष्य एक ही हो और सभी उसकी पूर्ति के लिये समर्पित भाव से कार्य करें। थोड़ा-सा भी मतभेद संगठन में उसी भाँति फूट डाल देता है जैसे मनों दूध में थोड़ी-सी खटाई डालने पर वह फट जाता है।

व्यक्ति से समाज बड़ा है अतः अपना स्वार्थ छोड़कर सर्वहितकारी नियम को पालने में अपनी हानि भी होती हो, तो उसकी चिन्ता न करके सबका हित देखना चाहिये। सभी सदस्य जब एक स्वर में बोलते हैं तो उसका बहुत प्रभाव पड़ता है। इसलिये, भगवती वेदवाणी कह रही है-

        संगच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम्

तुम सब मिलकर एक काम में लग जाओ तभी सफलता मिलेगी। जो निश्चय एक बार कर लिया, उसी पर अडिग बने रहो। मिल कर एक ही बात बोलो। स्मरण रहे- अलग-अलग बोलने से कार्यकर्त्ता भ्रमित हो जाते हैं और दूसरे लोगों का विश्वास ऐसे संगठन से उठ जाता है। एक बात तभी कही जा सकती है, जब सबका चिन्तन एक जैसा हो। जहां स्वार्थ वृत्ति आई, वहीं पर शब्द बदल जाते हैं।

२.     महान् उद्देश्य – समान उद्देश्य भी ऐसा होना चाहिये, जो बहुजनहिताय बहुजनसुखाय वाला हो। जिस कार्य से बहुत लोगों का भला होता हो, उसके साथ बहुत से लोग जुड़ जाते हैं।

३.     अनुशासन– आर्यसमाज का दसवां नियम- सब मनुष्यों को सामाजिक सर्वहितकारी नियम पालने में परतन्त्र रहना चाहिये और प्रत्येक हितकारी नियम में सब स्वतन्त्र रहें, मननीय है। मनीषियों का कहना है-

सर्वे यत्र नेतारः सर्वे पण्डितमानिनः।

सर्वे यत्र वक्तारस्तत् कुलमवसीदति।।

जहाँ सभी नेता हों। सभी अपने को पण्डित या बुद्धिमान् मानते हों, सभी बोलने वाले हों, वह संगठन या कुल-परिवार नष्ट हो जाता है। किसी कार्य में मतभेद होने पर बहुमत का आदर करके या नेता के आदेश को मानते हुये कार्य में लग जाना चाहिये। एक बार निर्णय हो जाने के पश्चात् मीन-मेख निकालना संगठन की जड़ों पर कुठाराघात करना है। परन्तु ध्यान रहे अनुशासन बाह्य न होकर स्वैच्छिक होता है। बलात् दिया गया आदेश, आगे विद्रोह का रूप भी धारण कर सकता है।

४.     विश्वा– संगठन के कार्यकर्त्ताओं में अपने ध्येय, नेता और परम्पराओं के प्रति निष्ठा का होना बहुत आवश्यक है। वेद ने कहा है- ‘समाना हृदयानि वः’तुम्हारे हृदय समान हों। संगठन एवं नेता में विश्वास कार्यकर्त्ता को अपने कर्तव्य से विचलित नहीं होने देता। जहाँ आपस में विश्वास नहीं है, कानों का कच्चापन है, उस संगठन को टूटने में देर नहीं लगती। 

नेता का यह कर्तव्य है कि वह सुनी-सुनाई बात के आधार पर सत्य को जाने बिना अपने साथियों की नीयत पर शक नहीं करे। कई बार चापलूसों के द्वारा किसी कार्यकर्त्ता के विरुद्ध कान भर देने से संगठन के अच्छे कार्यकर्त्ता टूट जाते हैं, जिनकी क्षतिपूर्ति नहीं हो पाती।

५.     आत्मनिरीक्षण– अपने से पहले बने संगठनों का अध्ययन, उनकी कार्यपद्धति, उपलब्धियाँ एवं असफलताओं का विचार करते रहना चाहिये। इस बात को वेद ने- ‘देवा भागं यथापूर्वे संजानाना उपासते’ द्वारा कहा है। हे मनुष्यो। जैसे तुम्हारे से पहले के विद्वान् लोग परस्पर एक दूसरे का सहयोग करते रहे हैं, वैसे तुम भी करो।

६.     मनोबल-किसी भी कार्य में सफलता उसे मनोयोग द्वारा करने पर ही मिलती है। उत्साहपूर्वक किया गया कार्य अवश्य ही पूरा होता है। कई बार कार्य में बाधायें भी आती हैं तब

त्याज्यं धैर्य विधुरेऽपिकाले धैर्यात् कदाचित् स्थिति अमाप्नुयात् सः। यथा समुद्रेऽपि पोतभंगे सांयान्त्रिको वाञ्छति तर्तुमेव।।

विपरीत परिस्थिति होने पर भी धैर्य को नहीं छोड़ना चाहिये। जैसे- समुद्र में जहाज के टूट जाने पर भी कुशल नाविक पार जाने के लिये ही प्रयत्न करते हैं। वेदमन्त्र उत्साहित करते हुये कह रहा है- समानमस्तु वो मनः’ तुम्हारे मनन, चिन्तन, विचार एक हों। तुम्हारा निश्चय एक हो। मन के हारे हार है मन के जीते जीत।

७.     आदर्श नेता– संगठन को गति देने में नेता का वही स्थान है जैसे रेलगाड़ी को खींचने में इञ्जिन का। नेता ही माला के मणकों के समान विविध योग्यताओं वाले कार्यकर्त्ताओं को एक सूत्र में बांधे रखता है। नेता की कथनी और करनी एक जैसी होनी चाहिये। समानो मन्त्रः समितिः समानी’ तुम्हारा विचार एक हो। तुम्हारी सभा एक हो। नेता उस सभा का मुख्य अधिकारी होता है इसलिये उसका यह दायित्व है कि संगठन के कार्यकत्ताओं को मिलाकर रखे और अलग-अलग गुटबन्दी नहीं बनने दे। नेता का त्याग और स्नेह ही कार्यकर्त्ताओं का मनोबल बनाये रखता है। नेता का जीवन खुला अध्याय होना चाहिये। उसके वैयक्तिक और सामाजिक जीवन में अन्तर नहीं होना चाहिये। उसे विचारना चाहिये कि मैं केवल दो आँखों से देखता हूँ परन्तु मुझे सहस्त्रों नेत्र देख रहे हैं। नेता की की हुई छोटी सी भूल भी संगठन के लिये हानिकारक है।

संगठन में बहुत शक्ति होती है। लकड़ियों का बंधा हुआ गट्ठा बलवान् व्यक्ति भी नहीं तोड़ पाता, परन्तु उनको पृथक् कर देने पर अल्पबल वाला भी उन्हें तोड़ देता है। चूल्हे में लकड़ी और अंगीठी में कोयले मिलाकर जलाने से ही अग्नि प्रज्वलित होती है। यदि उन्हें बाहर निकाल दिया जाये, तो लकड़ी धुआं देने लगेगी और कोयला बुझ जायेगा। इसमें कारण यह है कि चूल्हे और अंगीठी में उन्हें संगठन की ऊर्जा मिलती थी और बाहर उसका अभाव हो जाने से वे बुझ गये।

परमात्मा की बनाई हुई सृष्टि में एक-एक परमाणु दूसरे से मिलकर ही जगत् की रचना करता है। बूंद-बूंद से घड़ा भर जाता है। बादल की नन्हीं बूंदों से बड़े-बड़े सागर भर जाते हैं। वायु के हल्के झोंके मिलकर प्रबल झञ्झावात एवं तूफान का रूप धारण कर प्रलय का दृश्य उपस्थित कर देते हैं। अग्नि के कुछ स्फुल्लिंग मिलकर प्रचण्ड दावानल बन जंगलों को भस्मसात् कर देते हैं। छोटे-छोटे तृण रस्सा बनकर मस्त हाथियों को भी बान्ध लेते हैं तो सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी मानव यदि संगठित होकर कार्य करे तो उसके लिये असम्भव कुछ भी नहीं रह जाता। संसार के सभी वैभव उसके चरणों में उपस्थित हो जाते हैं। शत्रु उनकी ओर आँख उठाकर देखने का भी साहस नहीं करता। धन्य हैं वे लोग, समाज या राष्ट्र जो संगठित होकर वेद की इस आज्ञा को शिरोधार्य मान, एक दूसरे का सहयोग करते हुये विद्या, राज्य और ऐश्वर्य की वृद्धि करते हैं। उनके यश एवं कीर्ति की दुन्दुभि सर्वत्र गूंज उठती है।

इच्छा से छूटें कैसे?

-स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक

इच्छा से छूटें कैसे? उत्तर है- इससे उल्टा काम करो। जहाँ सुख दिखता है, वहाँ-वहाँ दुख देखना शुरू करो। जब दुख देखना शुरू करेंगे, तो इच्छा स्वतः खत्म हो जाएगी।

वेद काव्य का वास्तविक अध्ययन

-डाक्टर धीरज कुमार आर्य

परमकवि का प्रथम काव्य अजर-अमर है, जिसे वेद चतुष्टय कहा जाता है, जो शब्दमय है। दूसरा काव्य यह प्रत्यक्ष जगत् है, जो अर्थमय है और नश्वर है। प्रथम काव्य में जो कुछ अंकित है दूसरे काव्य में उसी का अर्थ है। दोनों में समन्वय है। यह समन्वय ही दोनों को एक कर्त्ता  की दो विभिन्न कृतियाँ सिद्ध करता है। एक के अध्ययन से दूसरे का ज्ञान होता है। वेद काव्य में जैसे ही अध्येता ने पढ़ा -अन्योऽन्यमभिर्यत वत्सं जातमिवाध्न्या (अथर्ववेद ३//३0//१) आपस में तुम ऐसे ही प्यार करो जैसे गौ अपने नवजात बछड़े से प्यार करती है, तो तत्काल वह सृष्टिकाव्य के पन्ने पर बछड़े को चाटती हुई गौ का प्रत्यक्ष  करता है। यह है वेद काव्य का वास्तविक अध्ययन। इस प्रकार के अध्ययन से ही सृष्टि के सब रहस्यों की उलझन सुलझती है।

                                                   

आत्मा की सिद्धि   

डाक्टर धीरज कुमार आर्य              

दर्शन और स्पर्शन इन्द्रियों के द्वारा एक अर्थ के ग्रहण से दोनों एक के आश्रय होने से आत्मा की सिद्धि होती है। (न्याय0 ३//१//१) अर्थात् नेत्रों से जिस वस्तु को देखा जाता है, हाथ से उसी को स्पर्श किया जाता है। दोनों की अनुभूति एक के अन्दर होने से, कि मैं ही देखता हूँ, मैं ही छूता हूँ, यह ‘मैं’ दर्शन और स्पर्शन दोनों में आत्मा का साधक है।

                                                                                                            

ज्ञान और भाषा का संबन्ध

डाक्टर धीरज कुमार आर्य

ज्ञान और भाषा का नित्य संबन्ध है। एक के बिना दूसरा संभव नहीं। ज्ञान और भाषा की उत्पत्ति मनुष्य स्वयं नहीं कर सकता। प्रारम्भ में वह उन्हें मानव-परम्परा से ग्रहण करता है। क्योंकि ज्ञान दो प्रकार का होता है- एक स्वाभाविक और दूसरा नैमित्तिक। मनुष्येतर सभी प्राणियों का जीवन स्वाभाविक ज्ञान पर ही निर्भर होता है। उन्हें किसी भी प्रकार के नैमित्तिक ज्ञान की आवश्यकता नहीं होती। किन्तु, मनुष्य एक ऐसा प्राणी है जिसका जीवन केवल स्वाभाविक ज्ञान से नहीं चल सकता उसे नैमित्तिक ज्ञान की परमावश्यकता होती है। वह ज्ञान उसे माता-पिता, गुरु, समाज आदि से प्राप्त होता है। सृष्टि के आदि में जब प्रथम मानवोत्पत्ति हुई तब मानव परम्परा न होने से नैमित्तिक ज्ञान के अभाव में उनका जीवन सम्भव ही न होता, यदि उनके आत्मा में ज्ञान के आदिस्रोत के रूप में वेदों का ज्ञान प्रादुर्भूत न होता। सृष्टि के आदि में, जो वेद रूप में ज्ञान व भाषा मानव को प्रदान करती है, वह परमसत्ता ईश्वर ही है।

-ईश्वर को अन्तर्यामी इसलिए कहा जाता है, क्योंकि वह हमें अंदर से नियन्त्रित करता है।

-आचार्य अंकित प्रभाकर

-जैसे बच्चा कभी भी स्कूल बनाने का समर्थक नहीं होता, परन्तु उम्र के साथ व्यक्ति स्कूलों की उपयोगिता समझ जाता है, इसी तरह साधारण लोग सृष्टि बनाने का प्रयोजन नहीं समझ पाते।

-आचार्य अंकित प्रभाकर

-प्रत्येक वस्तु का स्वभावतः अपना एक नाम होता है। इसी बात को शब्द और उसके द्वारा द्योतक वस्तु के नित्य सम्बन्ध के रुप में भी कहा जाता है। ठीक इसी तरह ईश्वर का निज नाम ओम है। यह नाम उसको किसी के द्वारा दिया नहीं गया। यह ठीक वैसे ही है, जैसे सूर्य और उसके प्रकाश को अलग नहीं किया जा सकता अथवा जैसे, पिता पुत्र के सम्बन्ध को मिटाया नहीं जा सकता।

-आचार्य अंकित प्रभाकर

जब तक प्रत्यक्ष सम्भव नहीं, तब तक उस वस्तु को कैसे जानें?

-आचार्य सत्यजित आर्य

कोई भी बात यदि हम शब्द प्रमाण या अनुमान प्रमाण से जानते हैं, तो, हालाँकि अनुमान प्रमाण हमें हमारी जिज्ञासा की वास्तविक तृप्ति के ओर पास ले जाने वाला होता है, परन्तु, अन्तिम तृप्ति तो उस वस्तु का प्रत्यक्ष करने पर ही होती है। परन्तु, अब समस्या यह खड़ी होती है कि जब तक हमने किसी वस्तु को प्रत्यक्ष प्रमाण से नहीं जाना, तब तक उस वस्तु के स्वरूप का किस तरह का बोध रखें? इसका उत्तर यह है कि प्रत्यक्ष से पहले उस वस्तु के स्वरूप का बोध शब्द प्रमाण या अनुमान प्रमाण से किया जाना चाहिए। यह सूत्र व्यवहारिक दृष्टि से अत्यंत श्रेष्ठ है, क्योंकि यह सम्भव ही नहीं कि वस्तु के प्रत्यक्ष से पहले हम उस वस्तु के बारे में किसी तरह का ज्ञान न रखें। यदि, हम किसी वस्तु का प्रत्यक्ष करने से पहले उस वस्तु को जानने के लिए शब्द प्रमाण या अनुमान प्रमाण का प्रयोग न करें, तो हमें उस वस्तु के बारे में मिथ्या ज्ञान ही होगा।

आदि और अनादि पदार्थों को कैसे जाना जाता है?

-स्वामी विवेकानंद परिव्राजक

इस संसार में कुछ आदि पदार्थ (उत्पन्न और नष्ट होने वाले) भी हैं और कुछ अनादि (जो न कभी उत्पन्न होते और न कभी नष्ट) भी। अब प्रश्न उठता है कि हम कैसे जान सकते हैं कि कौन से पदार्थ आदि हैं और कौन से अनादि। किसी भी चीज के उत्पन्न होने में तीन तरह के कारण होते है- एक, निमित्त कारण अर्थात बनाने वाला, दो, उपादान कारण अर्थात कच्चा माल, जिससे वह चीज बनाई जाती है, जैसे घड़े के संदर्भ में मिट्टी, तीसरा, साधारण कारण अर्थात वे उपकरण आदि जो उस वस्तु को बनाने में प्रयोग होते हैं। जिस भी वस्तु की उत्पत्ति के तीनों कारण संसार में उपलब्ध हों, वह आदि और जिस वस्तु की उत्पत्ति के तीनों कारण संसार में उपलब्ध न हों, वह अनादि। इस संसार में मूल प्रकृति, आत्माएँ और ईश्वर सत्तात्मक तो हैं, अर्थात हम उनकी विद्यमानता को अनुभव तो कर सकते हैं, परन्तु इनकी उत्पत्ति के तीनों कारण संसार में दिखाई नहीं देते, अर्थात जानने में नहीं आते, इसलिए, इन तीन पदार्थों को अनादि माना गया है। आधुनिक विज्ञान के लोग इन तीन अनादि पदार्थों में से केवल प्रकृति को ही कुछ अंशों में जान पाए हैं।