उपासना में श्रेष्ठता लाने के सूत्र
-ध्यान, उपासना आदि का ध्येय एकाग्रता पाना न होकर अविद्या जनित राग द्वेष को कम करके ईश्वर के आनन्द को अनुभूत करना है। ध्यान जड़ वस्तुओं का भी किया जा सकता है, परन्तु जब ध्यान ईश्वर परक होता है, तो इसको ही उपासना नाम से भी कहा जाता है। इस निबन्ध में ध्यान शब्द का अर्थ ईश्वर परक ध्यान ही लिया गया है।
-वेद व ऋषियों द्वारा सुझाया गया उपासना का मार्ग सर्वश्रेष्ठ होने के साथ साथ सरल भी है। वस्तुतः, जब हम किसी प्रक्रिया को सर्वश्रेष्ठ कहते हैं, तो उसका सरलतम होना उसमें अंतर्भावित ही होता है। ऐसा नहीं हो सकता कि कोई प्रक्रिया सर्वश्रेष्ठ हो और कोई अन्य प्रक्रिया सरलतम हो।
-हमारा ऐसा विश्वास कि वेद व ऋषियों द्वारा सुझाया गया उपासना का मार्ग सर्वश्रेष्ठ व सरलतम है, हमारी उपासना की गुणवत्ता में वृद्धि करने वाला होता है। सरलता के चक्कर में वेद द्वारा सुझाए गए उपासना के मार्ग से किसी भिन्न मार्ग की तरफ आकर्षित होने से हम अपने आपको अंध-विश्वास के एक भवंडर में धकेल देते हैं।
-यह ठीक है कि उपासना में एकाग्रता की प्राप्ति होती है, परन्तु जब हम ध्यान, उपासना आदि का ध्येय एकाग्रता पाना मान लेते हैं, तो हम उपासना आदि से भिन्न क्रियाएं, जिनमें मन अधिक अच्छे से एकाग्र होता है, को ही प्रमुखता देने लगते हैं। ये बातें ईश्वर के आनंद को अनुभूत करने के हमारे अंतिम उद्देश्य में बहुत बड़ी बाधा हैं। एकाग्रता प्राप्त करके हमारी योग्यता, बल, यश आदि में तो वृद्धि हो जाती है, परन्तु इससे हमारी अविद्या दूर नहीं होती और हम क्लेशात्मक राग, द्वेष से ग्रसित रहते हैं। अविद्या के कारण, बहुत संभव है कि हम अपनी एकाग्रता का उपयोग बुरे कार्यों के लिए करें।
-हमारे उपासना के स्तर को और अधिक ऊँचा उठाने के लिए आवश्यक है कि हम इस क्रिया के क्रम को समझें। प्रारम्भिक व्यक्ति के लिए समय पर उपासना के लिए बैठना ही अपने आप में श्रेयस्कर है। कुछ समय पश्चात्, जब व्यक्ति के लिए उपासना में बैठना सहज हो जाता है, तो उसके लिए उचित विचारों को अपने मन में उठाना, चाहे वे विचार बहुत थोड़े समय के लिए ही उसके चिंतन में आ पाएँ, अपने आप में एक उपलब्धि है। जब व्यक्ति का उचित विचारों को थोड़े समय के लिए चिंतन में लाना सहज हो जाता है, तो उसको उचित विचारों को अधिक समय के लिए चिंतन में लाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। उसको अपने चिन्तन में भावुकता, दृढ़ता और तीव्रता का समावेश करने के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है। ऐसा चलता ही रहता है। हर साधक इसी कर्म से धीरे-धीरे अपने उपासना के स्तर को ऊँचा उठा पाता है। इसलिए, संघर्ष की स्थिति में निराश होने की कोई आवश्यकता नहीं होती।
-उपासना में अच्छी गति न हो पाने का एक कारण साधकों के भीतर ऐसा विचार उठना है कि वे समाज में रहते हुए उससे बहुत तरह का सहयोग तो ले रहे हैं परन्तु, वे समाज के लिए कुछ कर नहीं रहे। ऐसे विचारों के तर्कपूर्ण समाधान नीचे दिए गए हैं-
1 समाज के उत्थान के लिए बहुत से कार्य करने योग्य होते हैं, परन्तु, उन सब के लिए एक व्यक्ति जिम्मेदार नहीं होता। हमें केवल एक क्षेत्र चुनना होता है और उसमें अपने सामर्थ्यानुसार योगदान देते हुए संतोष की अनुभूति करनी होती है।
2 समाज के उत्थान के लिए मनुष्य-जीवन को सफल बनाना अपने आप में एक बहुत बड़ा काम है।
3 निर्माण-काल के दौरान कोई सामाजिक उत्तरदायित्व नहीं होता। सामाजिक उत्तरदायित्वों को स्वयं के निर्माण के पश्चात् ही पूरा करना होता है। निर्माण-काल के दौरान पूरी निष्ठा से अपना निर्माण करना व जिस संस्था में रहकर हम अपना निर्माण कर रहे होते हैं, उसमें अनुशासित होकर रहना ही साधक का वर्त्तमान का उत्तरदायित्व होता है।
-किसी भी काम को प्रारम्भ करने से पहले हमें उस काम के अनुरूप अपनी शारीरिक व मानसिक अनुकूलता बनानी होती है। इसी तरह, उपासना करने से पहले भी हमें ईश्वर के लाभों के चिंतन के माध्यम से अपनी मानसिक अनुकूलता बनानी होती है। उपासना के लिए अपनी शारीरिक अनुकूलता हेतु हमें उन सभी बाधाओं को हटाना होता है, जिनको हम अपनी उपासना में विघ्न के रूप में देखते हैं।
-पढ़ाई-लिखाई के किसी भी स्तर वाला और जीवन की किसी भी अवस्था वाला व्यक्ति साधना के पथ पर उन्नति कर सकता है।
-उपासना में आँखों को बंद करने से हमारे मन का बहुत सा व्यापार कम हो जाता है। वैसे तो सभी ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से हमारे मन का व्यापार चलता रहता है, परन्तु उनको रोकना आँखों को बंद करने जैसा सरल नहीं। उपासना में ज्ञानेन्द्रियों को बंद करके मन का व्यापार बंद करना अपेक्षित नहीं होता।
शब्द यदि अर्थहीन हों तो, वे हमारी उपासना को अधिक प्रभावित नहीं कर पाते। हमारे शरीर में यह सामर्थ्य होता है कि वह अनचाही ध्वनियों को उपेक्षित कर सके। फिर भी, यदि कोई ध्वनि बहुत अधिक प्रभावित करे, तो उपासना के दौरान ear plugs आदि का प्रयोग किया जा सकता है।
-यदि, कभी किसी तरह की मानसिक परेशानी के कारण हमारा ध्यान में बैठने का ही मन न करे, तो हम कुछ समय के लिए अपने मन को कुछ आसान सी क्रियाओं को करने में लगा सकते, जैसे कि पानी पीना, कोई सेवा का कार्य करना, कोई संगीत सुनना, कोई भजन सुनना आदि। ऐसी क्रियायों के द्वारा ध्यान के समय में विलम्ब करके हमारा ध्यान में बैठना सुगम हो जाता है।
-उपासना का अच्छा होना हमारी रुचि पर बहुत निर्भर करता है।
-व्यक्ति ईश्वर की स्तुति प्रार्थना उपासना तभी करता है, जब उसे महसूस हो कि उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति केवल ईश्वर ही कर सकता है। संसार में भी हम देखते हैं कि व्यक्ति तभी किसी से प्रार्थना करता है, जब उसे महसूस हो कि वह स्वयं उस दुख कष्ट बाधा को नहीं हटा सकता। यदि, व्यक्ति को लगता है कि वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति स्वयं या अपने सगे-सम्बन्धियों की मदद से कर सकता है, तो उसकी ईश्वर-उपासना में रुचि नहीं बनती और यदि, ऐसा व्यक्ति ईश्वर-उपासना करता भी है, तो ईश्वर के प्रति उसकी प्रीति दृढ़ नहीं होती। इसलिए, आवश्यक है कि हम निर्बाध, निरन्तर और उच्चतम सुख-प्राप्ति की कामना करने के साथ-साथ अपने दुखों की पूर्ण निवृत्ति की कामना करें। क्योंकि, ये कामनाएं केवल ईश्वर के सहाय से ही पूर्ण हो सकती हैं, इसलिए ईश्वर के प्रति प्रीति में कभी भी कमी नहीं आती और हम हृदय से ईश्वर की स्तुति कर पाते हैं।
-हमारी स्तुति और प्रार्थना की मात्रा व गुणवत्ता जितनी अधिक अच्छी होगी, उतनी ही अच्छी हमारी उपासना हो पाएगी। स्तुति में हमने केवल अर्थ को ही बार-बार रटना नहीं होता, बल्कि उस अर्थ के साथ कृतज्ञता की भावना करना भी आवश्यक है। जब हम स्तुति करें, तो स्वयं को ईश्वर के साथ जोड़कर देखें, जैसे मेरा ईश्वर ऐसा, मेरा ईश्वर ऐसा आदि आदि। परन्तु, ऐसा करते हुए हममें अहंकार की भावना नहीं आनी चाहिए। ईश्वर की स्तुति सदैव नम्रतापूर्वक ही करनी चाहिए। नम्रतापूर्वक स्तुति करने का अर्थ है कि उस ईश्वर की महानता को अनुभव करना। स्तुति का ध्येय प्रार्थना न होकर कृतज्ञता का भाव होना चाहिए, अर्थात जो कुछ ईश्वर ने अब तक हमारे किए किया है, उसके लिए ईश्वर का धन्यवादी होना ईश्वर की सच्ची स्तुति है। प्रार्थना तो वो है, जो हमें ईश्वर भविष्य में प्रदान करेगा। ईश्वर का हमारी प्रार्थनाओं को पूरा करने का विधान अलग है।
-उपासना में ईश्वर की स्तुति का अत्यन्त महत्त्व है। ईश्वर की शुद्ध स्तुति हमें शुद्ध उपासना की और तो ले जाने वाली होती ही है, इससे सांसारिक व्यवहार से उत्पन्न अथवा हमारे द्वारा कल्पित हमारे बहुत से दुख भी दूर हो जाते हैं। हम ईश्वर के किसी भी गुण को पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं कर सकते। हम ईश्वर के गुणों को उतने ही अंशों में प्राप्त कर पाते हैं, जितने अंशों में वे हमारी मुक्ति के लिए आवश्यक हों। यह सत्य है कि उपासना करने से ईश्वर के गुण हममें आते हैं, परन्तु उन गुणों को प्राप्त करने के लिए हमें विशेष प्रयत्न भी करना होता है और वह प्रयत्न है- अपनी विद्या को शुद्ध करते रहना। ईश्वर के गुण अभयता को प्राप्त करने से हमारे बहुत से अविद्याजन्य दुख समाप्त हो जाते हैं। सार रूप में कहा जाए, तो भिन्न भिन्न शब्दों के माध्यम से ईश्वर की अभयता का विचार करने मात्र से ईश्वर की अभयता हम में नहीं आती। जो इस बात को नहीं समझते, उनमें विभिन्न सांसारिक परिस्थितियों में अकर्मण्यता देखने में आती है।
-व्यवहार काल में अथवा उपासना से भिन्न समय में हमारा अपने साथ व अन्यों के साथ किया व्यवहार उपासना की गुणवत्ता को बहुत प्रभावित करता है। इसलिए, उपासना से भिन्न समय में, जब हम यम नियम का पालन कर रहे होते हैं, तो हम परोक्ष रूप से उपासना ही कर रहे होते हैं। जहाँ यह ठीक है कि यदि हम अपनी उपासना में श्रेष्ठता लाना चाहते हैं, तो हमें अपने व्यवहार को अधिक से अधिक शुद्ध करना होगा, वहाँ यह भी ठीक है कि हमारे व्यवहार के शुद्ध होने से हमारी उपासना स्वतः अच्छी हो जाती है और उपासना के अच्छे होने से व्यवहार में आने वाली मुश्किलें आसान हो जाती हैं, अर्थात् हम अपने व्यवहार में सन्तुलन व शान्ति बना पाते हैं।
-यह ठीक है कि यमों और नियमों को अपने व्यवहार में लाने से हमारी उपासना अधिक अच्छी हो पाती है। परन्तु, ऐसा सोचना कि यम, नियम, आसन आदि को सिद्ध करने के बाद ही हमें उपासना करनी चाहिए, गलत है।
-ऊपर कहा जा चुका है कि उपासना की गुणवत्ता पर यमों और नियमों के पालन का बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है। नियमों में दूसरा नियम संतोष का है। संतोष के बहुत से स्तर होते हैं। मोटे तौर पर, एक ऊपर-ऊपर से संतोष होता है और दूसरा होता है- आन्तरिक सन्तोष। आन्तरिक असन्तोष सभी सुखों को ध्वस्त कर देता है। जितना-जितना आन्तरिक असन्तोष किसी व्यक्ति में कम होता जाता है, उतना-उतना वह साधना-पथ पर आगे बढ़ जाता है। जहां यह सत्य है कि आन्तरिक असन्तोष के कम होने से व्यक्ति की उपासना में गति अच्छी होती है, वहाँ यह भी सत्य है कि आन्तरिक असन्तोष को दूर करने में उपासना का बहुत अधिक हाथ होता है।
-साधना में तप का विशेष स्थान है। कहा भी जाता है कि अतपस्वी की साधना कभी सफल नहीं होती। लेकिन, तप भी बुद्धिपूर्वक ही किया जाना चाहिए। बार-बार खींचने से या धक्का मारने से रस्सी की गांठें शिथिल तो होती हैं या रस्सी टूट तो जाती है, परन्तु इसमें बहुत अधिक श्रम और समय लगता है। इसकी जगह यदि बुद्धिपूर्वक विचारा जाए कि रस्सी की गांठें कहाँ-कहाँ हैं और उनको खोलने की प्रक्रिया क्या है, तो बहुत कम यत्न से और बहुत कम समय में हम अपने रस्सी के बंधनों को खोल सकते हैं। इस संदर्भ में, स्वाध्याय हमारी बुद्धि को सही दिशा देने में विशेष कारगर सिद्ध होता है। इसी तरह, यह विचारना कि किस तरह हम जन्म-मरण के बन्धन से छूट सकते हैं और इस दिशा में हमारा क्रियाशील होना बुद्धिपूर्वक किया जाने वाला तप है और यह तप हमेशा आन्तरिक ही होता है।
-यदि, हमें उपासना काल में कलुषित विचार उपासना से भिन्न समय की अपेक्षा अधिक परेशान करते हैं, तो डरकर उपासना छोड़ देने वाली कोई बात नहीं। जब हम गंदगी की सफाई करते हैं, तो दुर्गंध का बढ़ना कोई चिंता का विषय नहीं होता। ऐसी परिस्थिति में हम उपासना के दौरान ईश्वर के सहाय की याचना कर सकते हैं।
-मानसिक व्यवधान होते हुए भी उपासना में पूरी ईमानदारी से ईश्वर का सतत् विचार बनाए रखने का प्रयत्न करते रहना चाहिए। अनुकूल परिस्थितियों में भी उपासना करना कष्टप्रद होता है, परन्तु विपरीत अथवा प्रतिकूल परिस्थितियों में भी उपासना करते रहना अधिक कष्टप्रद है। मानसिक व्यवधान हमें प्रतिकूल परिस्थितियों में भी उपासना में डटे रहना सिखाते हैं।
-उपासना के उच्चतम लाभ तो हमें समय आने पर मिलेंगे ही, परन्तु आज हमारी जैसी भी स्थिति है, उसमें उपासना में बैठने से हमें पहले से अधिक पवित्र होने का सुख तो मिलता ही है। निरंतर उपासना में बैठने की क्रिया को करने से हम अपनी वृत्तियाँ और संस्कारों को व्यवस्थित करते हैं और हमारा यह तप हमें अपने अन्तिम उद्धेश्य के और पास ले जाने वाला होता है। प्रत्येक बार उपासना से उठने के बाद हमें और अधिक पवित्र होने का अहसास अवश्य होना चाहिए।
-ध्यान के मार्ग में उतार-चढ़ाव आना साधारण सी बात है। सभी साधकों को ऐसी समस्या आती ही है। ध्यान के किसी ऊँचे स्तर को छू लेने का अर्थ यह नहीं होता कि ध्यान का वह स्तर सदा रहेगा। इस बात को इस तरह समझा जा सकता है कि ढलान में साईकिल बहुत कम प्रयास से चलती है, जबकि चढ़ाई चढ़ते हुए बहुत प्रयास के बावजूद साईकिल धीरे-धीरे ही चल पाती है। किसी समय उपासना अच्छी न होने पर हमारे मन में किसी तरह की ग्लानि की भावना नहीं आनी चाहिए। उपासना अच्छी न होने के पीछे हमारे पिछले गलत संस्कार भी होते हैं। उपासना में हम पिछले गलत संस्कारों को हटाने का प्रयास ही करते हैं।
-जैसे, साईकिल के माध्यम से लम्बी दूरी तय करने के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि हम यात्रा के बीच बीच में साईकिल को दुरुस्त रखने के लिए कुछ समय निकालें, उसी तरह हमें कुछ समय निकालना होता है, ताकि हमारी ध्यान रूपी यात्रा निर्बाध गति से चलती रहे।
-उपासना में अच्छी गति के लिए मन की प्रसन्नता आवश्यक है। यदि किसी स्थान विशेष में अथवा किसी विशेष व्यक्ति के सान्निध्य में हमारी मन की प्रसन्नता बन पा रही है, तो हमें उपासना में ऐसे आलम्बनों का अवश्य प्रयोग करना चाहिए। परन्तु, हमें यह भी स्मरण रखना चाहिए कि बाहरी आलम्बन हमें अन्ततः छोड़ने ही होते हैं। बाहरी आलम्बनों, जैसे कि मंत्रों, भजनों आदि का सहारा केवल मात्र अधिक से अधिक आंतरिक गहराई प्राप्त करने के लिए ही लिया जाता है। ऐसा कोई नियम नहीं है कि उपासना किसी तरह के स्थान पर ही करनी चाहिए। स्थान चाहे कोई भी हो, नियम यह है कि उपासना करते समय हमारा मन प्रसन्न रहना चाहिए।
-सामान्यतः हम काफी हद तक अपनी उपासना के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ बना सकते हैं। बहुत कम समय होते हैं, जब हमें बहुत भीड़-भाड़ वाली जगह पर अपनी साधना करनी पड़ती है। हमें यह मान कर चलना चाहिए कि इस संसार में हमें सब कुछ और सब समय साधना के लिए अनुकूल वातावरण नहीं मिल सकता। प्रतिकूलताओं का कारण दूसरों के साथ-साथ हम स्वयं भी हो सकते हैं।
-अच्छी उपासना के लिए यह आवश्यक है कि विपरीत अथवा प्रतिकूल परिस्थितियों में हमारे मन में किसी तरह की खिन्नता नहीं आनी चाहिए।
-सामान्यतः प्रतिकूल परिस्थितियों में व्यक्ति को ईश्वर के चिन्तन का ध्यान ही नहीं आता। ऐसे में एक साधक को वैसी प्रतिकूल परिस्थितियों में कमी लाने का प्रयास करना चाहिए, ताकि प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण उपासना में आने वाली बाधाओं में कमी आए। यह प्रयास उचित स्वाध्याय व उचित शंका-समाधान के द्वारा किया जा सकता है। यदि, ये प्रतिकूल परिस्थितियां किन्हीं व्यक्तियों व उनके व्यवहारों के कारण हैं, तो उनका समाधान उचित व्यवस्था बनाकर या ऐसे व्यक्तियों की उपेक्षा करके किया जा सकता है। यदि, प्रतिकूल परिस्थितियां कुछ ऐसी हैं, जिनमें हमारे द्वारा कुछ नहीं किया जा सकता, तो हमें उपासना के प्रति अपने राग को बढ़ाना होता है, जिससे वे प्रतिकूल परिस्थितियां उपासना में कोई बाधा न खड़ी कर सकें। इसे खाना खाने के उदाहरण से समझते हैं। खाना खाने में विपरीत परिस्थितियाँ होने पर हम उन विपरीत परिस्थितियों के हटने का इन्तजार करते हैं या उन विपरीत परिस्थितियों को कम करने का प्रयास करते हैं और यदि उन विपरीत परिस्थितियों को हटाया अथवा कम नहीं किया जा सकता, तो भी हम खाना खाने को त्याग नहीं देते।
-उपासना में नियमबद्धता का होना बहुत महत्त्वपूर्ण होता है। परन्तु, नियमबद्धता के चक्कर में हमें किसी बाहरी प्रतिकूल परिस्थिति के कारण उपासना छोड़नी नहीं चाहिए। ऐसा करने से हम प्रतिकूल परिस्थितियों में सम रह पाने का अवसर गवाँ देते हैं व इससे हमारे मन में मुक्ति व मुक्ति के साधनों के प्रति अविद्यायुक्त राग उत्पन्न हो जाता है।
-यदि हम अपनी आंतरिक अवस्था अच्छी बना लें तो, बहुत सी छोटी-छोटी बाहर की प्रतिकूलताओं से हमारा ध्यान अपने आप हट जाता है। आंतरिक अवस्था अच्छी बनाने के लिए उपासना के लाभों का चिंतन बार-बार करना चाहिए।
-स्वाध्याय से उपासना के स्तर में वृद्धि होती है और हम पढ़ी व सुनी बातों को अधिक अच्छे से समझ पाते हैं। समझ का स्तर बढ़ने से हमारी उपासना अधिक अच्छी हो पाती है। इसलिए, हमें अपने मन में स्वाध्याय के प्रयोजन के बारे में सुस्पष्ट होना चाहिए। स्वाध्याय का अंतिम प्रयोजन अच्छी उपासना ही है। ध्यान और उपासना हमारे चित्त को अत्यंत सूक्ष्म रूप से शुद्ध करते जाते हैं और यह शुद्धता हमारे व्यवहार को और अच्छा कर देती है।
-उपासना में शब्द प्रमाण या अनुमान प्रमाण से प्राप्त की गई जानकारियों के अनुसार विचार उठाने को काल्पनिक अथवा झूठा नहीं कहा जा सकता।
-यदि, योग-साधना व सम्बन्धित दिनचर्या के कारण हमारे शरीर-धर्म के निर्वहन में कोई बाधा आ रही है, तो हमारा निर्णय हमेशा विवेक पर ही आश्रित होना चाहिए, अर्थात् उपासना काल आदि का निर्धारण विवेकपूर्ण ही होना चाहिए। उपासना काल के अधिक लम्बा होने के कारण या खाने-पीने में किसी तरह की कोताही के कारण, यदि हम अपने शरीर-धर्म को नहीं निभा पा रहे हैं, तो कालान्तर में ऐसी साधना हमारे दुख में वृद्धि करने वाली ही सिद्ध होगी और यह एक निश्चित सिद्धान्त है कि योग हमेशा दुख हटाने वाला होता है।
-अपना जीवन को सन्तुलित व व्यवस्थित चलाने के लिए, जहाँ हमें ज्ञान की आवश्यकता होती है, वहाँ भावनाओं का भी अपना स्थान है। परन्तु, जब भावनाओं को अधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता है, और अपने मस्तिष्क, विवेक, चिन्तन-मनन की उपेक्षा की जाती है, तो हमारा गलत दिशा में जाना प्रायः निश्चित हो जाता है। इसी तरह जब हम ज्ञान को भावनाओं से अधिक महत्त्वपूर्ण मानने लगते हैं, तो धर्म और अध्यात्म के मार्ग में जो विनम्रता चाहिए होती है, उससे हम विमुख हो जाते हैं। वैदिक उपासना में ज्ञान और भावनाओं का सन्तुलन होता है। हमारी भावनाएँ सदैव ज्ञान पर आधारित होनी चाहिएँ। वैदिक पद्वति में आरम्भ में ज्ञान की प्रधानता व भावनाओं की न्यूनता प्रतीत होती है। परन्तु, जैसे जैसे व्यक्ति ईश्वर के यथार्थ स्वरूप को जानता जाता है और उसको स्वीकृत करता जाता है, उसमें श्रद्धा की बढ़ोतरी होनी आरम्भ हो जाती है। यह श्रद्धा अचल और न गिरने वाली होती है।
-जप उपासना का बहुत महत्त्वपूर्ण अंग है, लेकिन तभी, जब इसके साथ भावना जुडी हुई हो। जप में संख्या, धुन, उतार-चढ़ाव आदि का विशेष महत्त्व नहीं होता। ईश्वर का वास्तविक जप तो उसकी आज्ञा पालन में है।
-यदि, अभ्यास से हम उपासना के दौरान अपनी उच्च-भावनाओं में दृढ़ता लाने में सफल हो जाते हैं, तो इस क्षेत्र में हमारी प्रगति बड़ी तीव्र हो जाती है।
-यह ठीक है कि ईश्वर को समर्पित होने का भाव उपासना में बहुत लाभकारी होता है, परन्तु इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि हम अपने कर्तृत्व को ही नकारने लगें। जब हम यह स्वीकार कर लेते हैं कि जैसे ईश्वर हमें हमारे कर्मों के बगैर कुछ भी प्रदान नहीं करता, वैसे ही उपासना में हमारी सफलता अथवा असफलता हमारे ही कर्मों के कारण होती है, तो हम परिस्थिति पर अधिक अच्छे से नियंत्रण कर पाते हैं।
-अपनी वृत्तियों पर नियन्त्रण पाने के कार्य में हर बार सफलता नहीं मिलती। एकाग्रता अथवा ईश्वर-चिंतन की जिस गहराई को छूने में हम एक बार सफल हो जाते हैं, उसी स्थिति को फिर से प्राप्त करने में हमें हफ़्तों का समय लग सकता है। यह कोई निराश होने वाली बात कतई नहीं है। हमारी हर सफलता, सफल होने की हमारी संभावनाओं को बढ़ा देती है। उदाहरण के लिए- एक धावक, जिसने किसी विशेष दूरी को किसी विशेष समयावधि में पूरा किया होता है, समान स्थिति को कईं असफलताओं के बाद ही दोबारा प्राप्त कर पाता है और वह भी तभी जब वह असफलताओं के बाद के प्रयत्न में, किसी तरह का मानसिक असंतोष नहीं उत्पन्न होने देता। इसी तरह हमारी हर सफलता हमें उत्साहित करने वाली होनी चाहिए।
-ईश्वर का चिन्तन व ध्यान करने का यह अर्थ कदापि नहीं होता कि हम ईश्वर के अतिरिक्त किसी अन्य वस्तु का का चिन्तन ही न करें। उदाहरण के लिए, जब हम ईश्वर के सृष्टिकर्त्ता होने को विचारते हैं, तो उन वस्तुओं का ध्यान आना बहुत सहज है, जिन वस्तुओं को ईश्वर ने रचा है। उपासना के दौरान ईश्वर के अतिरिक्त अन्य वस्तुओं का ध्यान आने को मन की भटकन नहीं कहा जाता, जब तक कि अन्य वस्तुओं का ध्यान गौण हो। चिन्तन में ईश्वर के विषय की मुख्यता होना परम आवश्यक है।
-आम देखा जाता है कि ध्यान, उपासना करने वाले इतने उत्साही अथवा पराक्रमी नहीं होते। अन्याय के विरुद्ध खड़ा होने वालों को कष्ट होने की बहुत अधिक संभावना होती है। उचित समय पर पराक्रम न दिखा पाने का मुख्य कारण डर ही होता है और वास्तविक उपासना डर के स्थान पर निर्भयता लाने वाली होती है। इसलिए, जो व्यक्ति ठीक रीति से उपासना करता है, उसमें जोश, पराक्रम आदि का अभाव हो ही नहीं सकता। जो जोशीले व पराक्रमी लोग देखने में आते हैं, वे ऐसा या तो अपने किसी स्वार्थ की सिद्धि के लिए करते हैं या अपनी अविवेकपूर्णता के कारण या लोकेषणा के कारण या अपने पुराने संस्कारों के वशीभूत होकर प्रक्रिया के रूप में। आध्यात्मिक व्यक्तियों का अपना पराक्रम दिखाने का इनमें से कोई भी कारण नहीं होता। इसलिए, सांसारिक व्यवहारों में वे पराक्रमहीन देखे जाते हैं।
-यह प्रश्न बहुत उठता है कि उपासना में ज्ञान की प्रधानता होनी चाहिए, अथवा भावना की। मुक्ति के पथ पर ज्ञान और भावना दोनों प्रधान हैं। इन दोनों की अपनी-अपनी महत्ता है। इसलिए, यह नहीं कहा जा सकता कि दोनों में से कौन अधिक मुख्य है। यह दोनों संयुक्त रूप से उपासना में सहयोगी हैं। जैसे, बिना ज्ञान के भावना अंधकार की ओर ले जाने वाली है, वैसे ही बिना भावना के ज्ञान मुक्ति तक ले जाने वाला नहीं हो सकता। दोनों महत्त्वपूर्ण होने के बावजूद, ज्ञान वाले व्यक्ति में भावना का उदय सम्भव है, परन्तु भावना वाले व्यक्ति में ज्ञान का उदय अपने-आप सम्भव नहीं। इसलिए, उपासना में हमें दोनों को साथ-साथ लेकर चलना होता है।
-व्यक्ति की ईश्वर के प्रति भावना उसके ज्ञान पर आधारित होती है। ज्ञान में बढ़ोतरी होती ही रहती है, जब तक वह पूर्ण शुद्ध नहीं हो जाता। जब व्यक्ति को पता चलता है कि उसका ज्ञान मिथ्या था, तो उसकी ईश्वर के प्रति भावना में कमी आना स्वाभाविक है। इसमें विचलित होने वाली कोई बात नहीं। हमारी आत्मा स्वभावतः परिशुद्ध ज्ञान की ओर आकर्षित होती है। इसलिए, हमें अपने ज्ञान को परिशुद्ध करने के लिए वेद व ऋषियों के वचन निरन्तर पढ़ते अथवा सुनते रहना चाहिए। जितनी हमारे ज्ञान में शुद्धता होगी, उतनी ईश्वर के प्रति हमारी भावना अविचलित होगी व हमारी उपासना सार्थक होगी।
-जितनी अधिक हम कोई प्रतिकूलता अनुभव करते हैं, उसी अनुपात में हमारे भीतर परेशानियों की भावनाएँ उभरती हैं। यह भी सत्य है कि ज्ञान का स्तर अधिक होने से हम प्रतिकूलताओं को कम अनुभव करते हैं और प्रतिकूलताओं के कम प्रतीत होने से हम भावनात्मक रूप से कम परेशान होते हैं। इसलिए, प्रतिकूलताओं को कम अनुभव करने के लिए व भावनात्मक रूप से नियन्त्रित रहने के लिए हमें स्वाध्याय व ध्यान उपासना की निरन्तरता को बनाए रखना होता है।
-भावना की उच्चता का उपासना की श्रेष्ठता पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है। भावना की उच्चता आती ज्ञान की उच्चता से ही है। अधिक ज्ञानवान होने का अर्थ अधिक शास्त्रों को पढ़ना नहीं होता, बल्कि भावनाओं का दृढ़ और तीव्र होना होता है। यह व्यक्ति के संस्कारों पर निर्भर करता है कि उसे उचित भावना बनाने के लिए कितने शास्त्रों को पढ़ना है या कितना श्रवण, मनन और निदिध्यासन करना है।
-ध्यान के समय कुछ परेशानियों को तो दूर रखा जा सकता है, परन्तु अपनी व्याधि, धन आदि संबन्धी कुछ परेशानियों को दूर रखना असम्भव होता है। हमारी आत्मा का स्वभाव ही ऐसा है कि यदि कोई ऐसी परेशानी होगी, तो हमारा मन उस परेशानी को हल करने का प्रयत्न करेगा ही करेगा। सामने आई मुश्किलों को ईश्वर के हवाले करने से हम बहुत हद तक ध्यान में अपनी एकाग्रता बढ़ा सकते हैं, परन्तु एक सीमा तक ही। जब हम हर मुश्किल को ईश्वर के हवाले करने लगते हैं, तो हमारा मन सवाल उठाने लगता है कि क्या मुश्किल को ईश्वर के हवाले करने से पहले हमे स्वयं कुछ नहीं करना चाहिए? ईश्वर के सत्य स्वरूप को जाने बिना मुश्किलों को ईश्वर को समर्पित करने से ऐसा होता है। इसलिए, कोशिश करनी चाहिए कि स्वाध्याय आदि के माध्यम से हमारी समझ कुछ इस तरह की बन जाए कि हमारा मन अधिक से अधिक वर्त्तमान और आने वाली परेशानियों के समाधान को जानने वाला हो। हमारी समझ ऐसी बनने से हमारा मन ध्यान के समय स्वयमेव ही एकाग्र हो जाएगा।
-कुछ लोग ऐसा अनुभव करते हैं कि ध्यान का समय छाया में बैठने के समान है। क्योंकि, ध्यान के समय में वे संसार के क्लेशों से छूटे रहते हैं, इसलिए, वे अपने व्यवहार-काल में कटौती करके ध्यान के समय को बढ़ाने में रुचि रखते हैं। ध्यान अथवा उपासना हमारे में वह समझ विकसित करती है, जिससे हम संसार के व्यवहार करते हुए भी क्लेशों से छूटे रह पाने में उन्नति कर पाते हैं और व्यवहार-काल की अपनी महत्ता को समझ पाते हैं। यदि, हम उपासना के इस दृष्टिकोण को नहीं समझ पाते, तो हम उपासना के वास्तविक लाभ से वंचित रह जाते हैं।
-उपासना की स्थिति में हम सांसारिक राग-द्वेष से हट जाते हैं और हम अधिक विवेकपूर्ण होते हैं। इस कारण, उपासना के दौरान ईश्वरीय प्रेरणाओं को पकड़ पाने का हमारा सामर्थ्य बढ़ जाता है। ईश्वर द्वारा निर्मित व्यवस्था इस तरह की है कि हमारा मस्तिष्क ईश्वरीय प्रेरणाओं को हम द्वारा पकड़ पाने में सक्षम न होने पर भी समस्या के समाधान तक तो हमें पहुंचा ही देता है, परन्तु वह समाधान ईश्वरीय प्रेरणाओं से कमतर ही होता है। उपासना के इस लाभ को हम आम तौर पर देख सकते हैं।
-जहाँ यह निश्चित है कि उपासना में हम समस्याओं के सर्वश्रेष्ठ समाधान को प्राप्त कर सकते हैं, वहाँ यह भी निश्चित है कि उचित रीति से उपासना करने वाले को समस्याओं का सर्वश्रेष्ठ समाधान स्वयमेव सूझ जाता है। परन्तु, उपासना का ध्येय कभी भी सांसारिक समस्याओं का समाधान पाना नहीं होना चाहिए।
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