ज्ञान कहाँ से आता है?
क्योंकि, संसार में तीन ही चीजें विद्यमान हैं- प्रकृति, आत्मा और ईश्वर, तो ज्ञान इन तीनों में से किसी एक से ही आ सकता है। अब इन तीनों वस्तुओं की विवेचना करते हैं। प्रकृति के पास तो ज्ञान है ही नहीं, तो ज्ञान प्रकृति से तो नहीं आ सकता। अब प्रकृति के अतिरिक्त ज्ञान आत्मा और परमात्मा में से किसी एक से ही आ सकता है। इस प्रश्न का सही समाधान न जानने के कारण एक बहुत बड़ा वर्ग यह मानता है कि ज्ञान आत्मा से ही आता है, अर्थात् सारा ज्ञान आत्मा में ही रहता है। उचित अवसर आने पर, अर्थात् पुस्तक आदि पढ़ने पर आत्मा में सोया पड़ा ज्ञान ही प्रकट हो उठता है। परन्तु, जो पेड़ आदि को देखने से ज्ञान होता है, उसके बारे में यह कहना कि वह ज्ञान आत्मा में पहले से अप्रकट अवस्था में विद्यमान था, बहुत बचकाना है। यदि ज्ञान प्रकृति और आत्मा से नहीं आता, तो हमें मानना पड़ता है कि ज्ञान ईश्वर से आता है, क्योंकि ज्ञान प्रकृति, आत्मा और ईश्वर के इलावा ओर किसी से आ ही नहीं सकता। विशेष परिस्थितियों को छोड़कर साधारणतया ज्ञान ईश्वर से नहीं आता। हम यह नहीं कह सकते कि जो ज्ञान हमें किसी वस्तु को देखने से अथवा छूने आदि से होता है, वह ईश्वर-प्रदत्त होता है। कुछ लोग ऐसा भी मानते हैं कि ज्ञान कहीं से आता नहीं, बल्कि उत्पन्न होता है। ऐसे में सिद्धान्त कि अभाव से भाव की उत्पत्ति नहीं हो सकती, आड़े आ जाता है।
वस्तुतः ज्ञान कहीं से गति करके नहीं आता, बल्कि यह उत्पन्न होता है। भाषा के प्रयोग में ‘ज्ञान प्राप्त करना’ आदि कह दिया जाता है, परन्तु वास्तव में ज्ञान गति नहीं करता। सिद्धांत कि भाव की अभाव से उत्पत्ति नहीं होती, केवल द्रव्यों पर लागू होता है। यह सिद्धान्त गुणों पर लागू नहीं होता और ज्ञान द्रव्य न होकर गुण है।
बोध तो चेतन आत्मा को ही होता है, परन्तु, जिन चिन्हों के माध्यम से हमें बोध होता है, उनको भी ‘ज्ञान’ कह दिया जाता है। उदाहरणार्थ- पुस्तकों आदि में कुछ वर्ण चिन्हित होते हैं, जिनको पढ़ने से हमारे भीतर कुछ सूचनाएँ मात्र प्रवेश करती हैं, जिनका विश्लेषण हमारे अन्तःकरण द्वारा किया जाता है और उस विश्लेषण के उपरान्त हमारी आत्मा में ज्ञान उत्पन्न होता है। परन्तु, पुस्तकों आदि को भी ‘ज्ञान के भण्डार’ कह दिया जाता है।
वैसे तो नियम है कि जो चीज हमसे बिछुड़ जाती है, वह चीज कम हो जाती है, परन्तु कोई भी व्यक्ति अपने ज्ञान को देता नहीं। वह तो बस अपने ज्ञान के अनुरूप कुछ शब्दों को बोलकर या लिखकर अपने द्वारा समझी बातों को दूसरों को बताने का प्रयत्न करता है। उसका ज्ञान तो उसके पास ही रहता है। दूसरों को समझाने से उसके ज्ञान की आवृति होती है और उसका ज्ञान और अधिक परिपक्व हो जाता है।
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