हवन की महत्ता
-मनुष्य को स्वस्थ और सुखी रहने के लिए जल और वायु की स्वच्छता परम आवश्यक है। आज संसार में, जल और वायु की अशुद्धि एक बड़ी भारी समस्या बनी हुई है। वैदिक संस्कृति में हवन इस समस्या का सर्वोत्तम समाधान है।
-वेदों और धर्म शास्त्र अर्थात् मनु स्मृति, रामायण, महाभारत आदि के अनुसार देव पूजन एक ही विधि से करने की आज्ञा है-वह विधि है अग्निहोत्र। हवन से जल और वायु की शुद्धि होती है, जिससे रोगों का निवारण होता है। इसलिए अग्निहोत्र दूसरों के भले के लिए किया जाने वाला सबसे अच्छा कर्म है। हवन न करने से मनुष्य को पाप लगता है। मनुष्य के शरीर से दुर्गन्ध निकलकर जितना जल, वायु आदि अशुद्ध होकर रोग उत्पत्ति करता है तथा प्राणियों को दुख देता है, उतना उस मनुष्य को पाप लगता है। उस पाप के निवारणार्थ कम से कम उतना सुगन्ध जल और वायु में फैलाना ही चाहिये।
-हवन में सब अच्छे-अच्छे पदार्थ अग्नि में ही क्यों डाले जाते हैं? जैसे शरीर के लिए सब शुभ पदार्थों को अंग विशेष पर न लगाकर के, मुख में डाला जाता है जहां से वे हमारे पेट में पहुंचते हैं व पाचन क्रिया द्वारा भिन्न-भिन्न अंगो को प्राप्त होते हैं। ठीक ऐसे ही अच्छे-अच्छे पदार्थों को जल, वायु आदि में न डाल कर अग्नि में डाला जाता है। अग्नि में यह शक्ति है कि वह उसमें डाले हुए पदार्थों को सूक्ष्म तत्वों में विघटित कर देती है। ये हल्के हुए सूक्ष्म तत्व हवा व वर्षा के जल को शुद्ध करते हैं। इससे हमें सांस की हवा व अन्न शुद्ध प्राप्त हो पाते हैं। अग्नि की भेदन शक्ति के कारण ही हमारे घरों की हवा, जो हमारे सांस आदि लेने से गंदी हो जाती है, स्वच्छ हवा द्वारा परिवर्तित की जा सकती है।
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