सत्य और असत्य को जानने की परीक्षाएं

-भूतकाल में हम विश्व गुरु थे। अगर वास्तव में सत्य हमारी उन्नति के लिए आवश्यक है, तो हमारे पूर्वज अवश्य ही सत्य को अपनाने वाले रहे होंगे। तो क्या सत्य को मानने व जानने के लिए कोई तरीके हमारे पूर्वजों ने सुझाए हैं?

सत्य को असत्य में से छाँटने के लिए ऋषि दयानंद ने पाँच तरह की परीक्षाएं सुझाई हैं। इन परीक्षाओं को इसी कर्म से घटाने के बाद ही किसी वस्तु को ग्रहण करना चाहिए।

पहली परीक्षा – वह वस्तु अथवा घटना ईश्वर के गुणों के अनुकूल होनी चाहिए। उदाहरणार्थ- क्योंकि, किसी व्यक्ति को बगैर उसके अन्याय के दोषी हाने के मार दिया जाना ईश्वर के गुण न्यायकारिता व दयालुता के विरुद्ध है, इसलिए इसे उचित नहीं ठहराया जा सकता।

दूसरी परीक्षा – वह वस्तु अथवा घटना सृष्टि नियमों के विरुद्ध नहीं होनी चाहिए। उदाहरणार्थ- यह मानना कि किसी शरीरधारी का शरीर कभी मृत्यु को प्राप्त नहीं होता, सृष्टि नियमों के विरुद्ध होने से असत्य है।

तीसरी परीक्षा – वह वस्तु अथवा घटना आप्त अर्थात धार्मिक, विद्वान् और सत्यवादी पुरुषों  के वचनों व व्यवहारों के अनुरूप होनी चाहिए।

चौथी परीक्षा – जो वस्तु व घटना हमारी आत्मा की प्रवृति के अनुरूप हो, वो सत्य और जो आत्मा की प्रवृति के विरुद्ध हो, वो असत्य। आत्मा की प्रवृति है कि उसे सुख प्रिय और दुख अप्रिय लगता हे। जो वस्तु हमे॑ प्रिय व अप्रिय लगती है, उसे अन्य आत्माओं के लिए भी वैसे ही जानें।

पांचवीं परीक्षा – किसी वस्तु अथवा घटना की सत्यता व असत्यता पर जो निर्णय प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों द्वारा हो, उसे स्वीकारें।

जो वस्तु ऊपर लिखीं परीक्षाओं में से एक भी परीक्षा में उत्तीर्ण होनी से रह जाती है, वो ग्राह्य नहीं। 

-सत्य को जानने की पहली कसौटी है कि वह चीज ईश्वर के गुण, कर्म और स्वभाव के अनुकूल होनी चाहिए। यदि, कोई चीज इस कसौटी पर खरी उतरती है, तो उसे दूसरी कसौटी पर तोलना होगा। दूसरी कसौटी यह है कि उसे सृष्टि नियमों के विरुद्ध नहीं होना चाहिए। अधिकतर चीजें जिन्हें हम सत्य समझते हैं, इन दो कसौटियों को ही पार नहीं कर सकती। पहली कसौटी के पूरी तरह लागू करने के लिए जरूरी है कि हम ईश्वर के गुण, कर्म और स्वभाव जो वेद में वर्णित हैं, उन्हें जाने। तब तक इस कसौटी को पूरी तरह स्थगित करने की आवश्यकता नहीं। अधिकतर जो गुण, कर्म और स्वभाव हम ईश्वर के मानते हैं, वो वेद में भी वर्णित हैं। यदि हम सृष्टि-नियमों को हर चीज पर घटाने की आदत डाल लेंगे, तो हमें अपनी मान्यताओं को संशोधित करने में बहुत आसानी होगी।

-सत्य को जानने का एक बहुत बढ़िया तरीका है कि हम हर बात  जानने के लिए तर्क का सहारा ले।  हमें बड़ा सावधान रहना पड़ता है कि कहीं तर्क करने की आदत के साथ-साथ, कुतर्क करने की प्रवृति भी हमारे भीतर  प्रवेश न कर जाए। कुतर्क कि आदत पड़ जाने पर हम मानने को तैयार ही नहीं होते कि हमारे द्वारा किया जाने वाला तर्क नहीं, कुतर्क है।