वैराग्य क्या है? इसका अभ्यास से क्या सम्बन्ध है?
वैराग्य– सामान्यतः, हम सभी में संसार की प्राप्त व अप्राप्त वस्तुओं का भोग करने की लालसा होती है। कुछ वस्तुओं के भोग करने की लालसा का पूरा होना असम्भव होता है, जैसे, सूर्य व चाँद पर जाना।
संसार की सभी वस्तुओं को भोगने की लालसा का समाप्त होना ही वैराग्य है। एक धारणा वाले व्यक्तियों का मानना है कि भोग किए बगैर किसी वस्तु से वैराग्य हो ही नहीं सकता। परन्तु, प्रत्यक्ष में हम बिलकुल इसके विपरीत देखते हैं। कुछ लोग भोग-विलास की पर्याप्त सामग्री रखते हुए भी वैरागी होते हैं, जैसे, राजा श्री राम चन्द्र, राजा श्री कृष्ण चन्द्र, राजा जनक, राजा भृतृहरि आदि। ऐसे लोग संसार की वस्तुओं को अपने भोग के उद्देश्य से इकट्ठा नहीं करते, बल्कि उनका उद्देश्य उन वस्तुओं से प्राणियों का कल्याण करना होता है। और यदि, भोग के पश्चात ही वैराग्य आता होता, तो जिन वस्तुओं का भोग असम्भव है, उनके प्रति हम कभी भी वैरागी नहीं हो सकते। इन बातों से यह बात तो साफ हो जाती है कि वैरागी होने के लिए वस्तुओं का भोग करना जरुरी नहीं है। बहुत बार वस्तुओं के भोग से उत्पन्न हुआ वैराग्य, भोग के पश्चात आने वाले रोगों के भय के कारण होता है।
वैराग्यवान होना निडरता लाता है, परन्तु कैसे? जब भी हम किन्हीं वस्तुओं को इकट्ठा करते हैं, तो उन वस्तुओं की रक्षा हेतु हमें बहुत तरह का भय आ घेरता है। हममें वास्तविक निडरता ही तब आती है, जब हममें वस्तुओं को भोगने की इच्छा ही समाप्त हो जाती है।
दीन-हीन होना वैराग्यवान होना नहीं है। सामान्यतः किसी वस्तु के न होने को ही गरीबी कह दिया जाता है। परन्तु, गरीबी तब होती है, जब कोई वस्तु मुझे चाहिए हो और वह वस्तु मेरे पास न हो। जो वस्तु, मुझे चाहिए ही नहीं, उसके न होने से मैं गरीब कैसे कहा जा सकता हूँ। सच्चा वैराग्य चीजों के प्रति मेरी चाहना समाप्त कर देता है। दूसरों के कल्याण के लिए वस्तुओं को इकट्ठा करने का, व्यक्ति के वैराग्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
वस्तुतः, सुख पाने के लिए वैरागी होना आवश्यक है। अपनी आवश्यकताओं को जानने के साथ-साथ हमें संसार की वस्तुओं को भी अच्छी तरह से जानना व समझना होता है, ताकि उनसे अपनी उन्नति के लिए उचित लाभ लिया जा सके। यहीं वैराग्य का सच्चा स्वरुप है। इसमें हमारी उन्नति के लिए आवश्यक वस्तुओं को पास रखा जाता है और अनावश्यक वस्तुओं को छोड़ा जाता है।
अभ्यास– किसी विषय पर पकड़ प्राप्त करने के लिए किसी क्रिया को बार-बार करने को अभ्यास कहा जाता है।
अभ्यास और वैराग्य में सम्बन्ध– वैसे तो ‘योग दर्शन’ में अभ्यास और वैराग्य मन पर नियन्त्रण पाने के साधन बताए गए हैं, परन्तु ये दोनों साधन किसी भी विषय को सुगम बनाने के लिए प्रयुक्त हो सकते हैं। इसी दृष्टि को सामने रखते हुए वैराग्य- मन की उस स्थिति का नाम है, जिसमें हम किसी विषय पर महारत हासिल करने में आने वाली बाधाओं को दूर करते हैं।
Leave A Comment