योग से सम्बन्धित कुछ विषय
– अब हम योग के स्थूल स्वरूप को व योग से सम्बन्धित कुछ विषयों को जानेंगे। जब योग शब्द का प्रयोग आध्यात्मिक पृष्ठभूमि में किया जाता है तब उसका अर्थ आत्मा को परमात्मा से जोड़ना होता है। महर्षि पंतजलि का लिखा ग्रंथ-‘योग दर्शन’ इस विषय का अंतिम प्राधिकरण (अथॉरिटी) है। इस ग्रंथ के अनुसार आत्मा को परमात्मा से जोड़ने की क्रिया के आठ अंग हैं। शरीर का स्वस्थ होना ‘योग’ के लिए अत्यन्त आवश्यक है। परन्तु इस का यह तात्पर्य नहीं कि हरेक क्रिया जिससे स्वास्थ्य लाभ होता है, को योग कहा जा सकता है। आज शरीर की कुछ विशेष क्रियाओं को, जिनसे स्वास्थ्य लाभ होता है, को ही योग समझा जाने लगा है। यहां, योग से सम्बन्धित विषयों पर ज्यादातर विचार स्वामी विष्वङ्ग जी के हैं।
– अहिंसा-लोक में यह मान्यता है कि किसी को कष्ट, पीड़ा व दु:ख देना हिंसा है। परन्तु वेद व ऋषियों का मन्तव्य यह है कि, हिंसा व अहिंसा अन्याय व न्याय पर खड़ी है। न्याय पूर्वक दण्ड अर्थात् कष्ट देना भी अहिंसा है व अन्याय पूर्वक पुरस्कार अर्थात् सुख देना भी हिंसा है। इस एक शब्द की गलत व्याख्या से हमारे देश को अत्यन्त हानि पहुंची है। हमें किसी से द्वेष नहीं करना चाहिए। परन्तु, इसका यह तात्पर्य नहीं कि जिन लोगों के कारण इस देश को घोर दुष्परिणाम भुगतना पड़ा है, उनके प्रति हमारे मन में अप्रीति की भावना भी न हो।
– अहिंसा की पालना किए बगैर योग का पौधा लग ही नहीं सकता। यह तो सभी मानते हैं कि मांस प्राणी को कष्ट दिए बगैर प्राप्त नहीं किया जा सकता। फिर, ऐसा कहने वालों के कि किसी व्यक्ति ने ईश्वर का साक्षात्कार कर रखा था, हालाँकि विशेष परिस्थितियों में वह मांस खा लेता था, समर्थन करने वाले लोग क्यों हैं? गाय एक जानवर होकर, किसी भी परिस्थिति में, भूख से मरना पसंद करती है, परन्तु मांस नहीं खाती। ऐसी धारणा वाले लोग इसलिए पल्वित हैं, क्योंकि हमें ऋषियों के वचनों पर श्रद्धा नहीं।
-स्वयं हिंसा न कर दूसरों द्वारा हिंसा किए जाने को मूक द्रष्टा बन देखते रहना भी हिंसा ही है। हिंसा का मूल ‘अन्याय’ है। दूसरों पर होते अन्याय का उचित प्रतिरोध न करना हिंसा का समर्थन करना ही है। इसलिए यह आवश्यक है कि अहिंसा का व्रत लेने वाला व्यक्ति स्वयं हिंसा न करने के साथ-साथ दूसरों द्वारा हिंसा किए जाने के विरोध में आवाज़ भी उठाए। हमें विचारना चाहिये कि इतनी योनियों में ये अनगणित प्राणी, जो कष्ट भोग रहे हैं, इसका कारण क्या है? तब हमें पता चलेगा कि हिंसा क्या है? और अहिंसा क्या है?
-साधरणतया यह कहा जाता है कि जिस झूठ से किसी का भला होता हो उसे बोलना कोई गलत नहीं। यह ठीक नहीं। हमारा झूठ किसी प्राणी को क्षणिक या एक घंटे तक या एक दिन तक या एक वर्ष तक या ज़्यादा से ज़्यादा एक जन्म तक लाभ तो पहुँचा सकता है, परन्तु उसका अन्तिम फल उस प्राणी के लिए हानिकारक ही होता है। विशेष परिस्थितियों में, यदि किसी वस्तु को यज्ञ भावना से वाणी से भाषित किया जाता है, तो वह अक्षरक्ष: सत्य न होने पर भी सत्य भाषण ही है। विशेष परिस्थितियों के होने का निर्णय प्रत्येक का आत्मा करता है। यज्ञ भावना क्या है? संक्षेप में कहा जाए तो, जो कर्म अन्याय के विरोध में सृष्टि के कल्याणार्थ किए जाते हैं, वे कर्म यज्ञ भावना से ओत-प्रोत माने जाते हैं।
-कहा गया है – सत्य बोलो प्रिय बोलो। ऐसा बहुत कम होता है कि कोई विषय सत्य भी हो और अप्रिय भी न हो। ऐसे समय में स्वयं का आत्मा ही निर्णायक होता है कि अप्रिय सत्य को बोला जाए या ना। हां, यदि किसी को प्रिय रूप में बोला सत्य भी कठोर लगता है, तो यह उसका दोष है। कुछ विद्वान ऐसा भी मानते हैं कि अपवाद स्वरूप झूठ भी बोला जा सकता है, परन्तु यह नितान्त आवश्यक है कि झूठ बोलने वाले की मनोवृति सात्विक हो। इस बात का कि अपवाद रूप में किसी की भलाई के लिए झूठ बोल लेना चाहिए, सहारा लेकर हम साधारण परिस्थितियों में भी अपने आप को झूठ बोलने से नहीं रोक पाते।
-ऋषि कहते हैं कि तुम्हारा कहना कि असत्य के बिना काम नहीं चलता, गलत है। जिस सत्य को झूठ बनाकर प्रस्तुत कर रहे हो, भले आदमी! उस सत्य को सत्य ही के रूप में प्रयोग करके तो देखो, एक बार में ही इसकी महत्ता का पता चल जायेगा। इस सर्वप्रिय शरीर को ही समाप्त करना पड़े, किन्तु सत्य को न छोड़ें। ये प्रश्न हमें स्वयं से पूछने चाहिए-इस झूठ से हम किसका कल्याण करना चाहते हैं? किसको सुख देना चाहते हैं? जिस झूठ से आज तक किसी का कल्याण नहीं हुआ है, उसी झूठ से हम अपना कल्याण करना चाहते हैं।
– अस्तेय– हमें बिना उसके स्वामी की स्वीकृति के किसी भी चीज का उपयोग नहीं करना चाहिए। यदि आवश्यकता लगे तो पूर्व में अपने मित्र, पति, पत्नी आदि की स्वीकृति लेकर रखें कि आप उनकी अनुपस्थिति में उनकी वस्तुओं का प्रयोग कर सकते हैं।
– ब्रह्मचर्य– इसका अर्थ यहां मात्र वीर्य व रज की रक्षा करना है। इनकी रक्षा न करके हम शरीर को नाजुक, कमज़ोर व रोग ग्रस्त बना लेते हैं। इन्द्रियों पर जितना संयम रखते हैं उतना ही ब्रह्मचर्य के पालन में सरलता रहती है। इन्द्रियों की चंचलता ब्रह्मचर्य के पालन में बाधक है। अपने लक्ष्य के प्रति सजग रहते हुए सदा पुरुषार्थी रहने से ब्रह्मचर्य के पालन में सहायता मिलती है। महापुरुषों, वीरों, ऋषियों, आदर्श पुरुषों के चरित्र को सदा समक्ष रखना चाहिए।
आचार्य कहते हैं-ये जो वीर्य व रज हैं, ये आहार का परम धाम हैं, उत्कृष्ट सार हैं, यदि तू वास्तव में अमृत पाना चाहता है तो इनकी रक्षा किया कर। यदि, असंयम से तूने इनका क्षय कर लिया, तो देख लेना समझ लेना तू, दुनिया भर के रोग आ जायेंगे तुझे। जैसे हम झूठ इसलिए बोलते हैं, क्योंकि सत्य की महिमा हमने नहीं जानी। हम चोरी इसलिए करते हैं, क्योंकि अस्तेय की महिमा हमने नहीं जानी। ठीक उसी प्रकार से संयम इसलिए नहीं रखते हैं, क्योंकि ब्रह्मचर्य की महिमा हमने नहीं जानी। एक बार हमको ये बोध हो जाये कि ब्रह्मचर्य की क्या महिमा है, तो व्याभिचार छोड़कर ब्रह्मचर्य पालन में लग जायेंगे।
शास्त्रों की सूक्ष्म-बातें सूक्ष्म-बुद्धि से ही समझी जा सकती है। बुद्धि सूक्ष्म तब होती है, जब हमारे शरीर में भोजन का सार प्रचुरता से होगा। भोजन का सार सूक्ष्म तत्त्व है ‘शुक्र’। शुक्र सुरक्षित रहेगा ब्रह्मचर्य पालन से।
– अपरिग्रह– मन, वाणी व शरीर से अनावश्यक वस्तुओं व अनावश्यक विचारों का संग्रह न करने को अपरिग्रह कहते हैं। परन्तु, अपरिग्रह का यह अभिप्राय बिलकुल नहीं है कि राष्ट्रपति व चपरासी के लिए वस्त्र आदि एक जैसे व समान मात्रा में होने चाहिए।
क्योंकि, हमारे अधिक साधनों के संग्रह से अनावश्यक उत्पादन बढ़ता है, जिससे पृथ्वी, जल आदि पन्च भूतों की हाऩि होती है, इसलिए हमें चाहिए कि हमारे साधनों का संग्रह हमारी आवश्यकताओं की परिधि में ही हो। यदि कभी अधिक संग्रह भी हो जाये, तो शेष को दान करते रहना चाहिए।
ये प्रश्न हमें स्वयं से पूछने चाहिए–आखिर इतना संग्रह किसके लिए करता हूँ? क्यों करता हूँ व कब तक करता रहूँगा? मैं कहाँ था? कब आया, क्यों आया? पहले का संग्रह कहाँ है? इस प्रकार के संग्रह से क्या होगा?
– तप– जीवन के लक्ष्य को पूरा करने के लिए हानि-लाभ, सुख-दुख, भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी, मान-अपमान आदि द्वन्दों को शान्ति व धैर्य से सहन करने को तप कहते हैं। आज हमने स्वयं को इतना कमजोर कर लिया है कि तकिये, बिस्तर, वाहन, पंखा, कूलर, ए.सी. कमरे आदि भौतिक पदार्थों के लिए, हम अपने जीवन के अंतिम लक्ष्य को ही भूल जाते हैं। जैसे ही कोई भौतिक विषय हमारे सामने उपस्थित होता है, हम सब कुछ भूल कर उसके साथ जुड़ जाते हैं।
परन्तु इतना त्याग न करें, कि अपका उद्देश्य धरा का धरा रह जाय व चित्त की प्रसन्नता चली जाए।
– स्वाध्याय- भौतिक-विद्या व आध्यात्मिक-विद्या दोनों का समन्वित अध्ययन स्वाध्याय कहलाता है। वेदों में दोनों- भौतिक विद्या व अध्यात्मिक विद्या हैं। इसलिए वेदों व ऋषि कृत ग्रन्थों के अध्ययन के बिना स्वाध्याय नहीं माना जाता। स्वाध्याय से हमें व्यवहारिक बातों को समझने में सहायता मिलती है।
– ‘ईश्वर – प्रणिधान‘ का अर्थ है – समर्पण करना। लोक में हम माता–पिता, अध्यापक, अधिकारी आदि के प्रति समर्पण की भावना की बात करते हैं। इसका अर्थ यहीं लिया जाता है कि जैसा माता-पिता, अध्यापक, अधिकारी आदि कहें वैसा ही करना। वैसे ही ईश्वर के प्रति समर्पण का अर्थ होगा, ईश्वर की आज्ञाओं का पालन अर्थात मानवतार्थ कर्म। ईश्वर की आज्ञा के अनुसार चलना होगा तो, हम हर वक्त ईश्वर को सामने रखेंगे और अपनी वाणी, सोच व कर्मों को अच्छी ओर ही लगाएंगे व अपने समस्त बल, धन, योग्यता, ज्ञान आदि को ईश्वर की आज्ञा के अनुरूप प्रयोग करेंगे। भक्ति का अर्थ भी समर्पण ही होता है।
– ‘आसन‘– आसन का मुख्य उद्देश्य शरीर को रोग मुक्त करना नहीं, बल्कि, प्राणायाम, धारणा, ध्यान और समाधि है। जिस शारीरिक मुद्रा में सामर्थ्यानुसार, बगैर विशेष प्रयत्न के, स्थिरता के साथ व लम्बे समय तक सुख पूर्वक बैठा जा सके, उसे आसन कहा गया है। अवस्था या रोग आदि के कारण हम ध्यान के लिए कुर्सी आदि पर भी बैठ सकते हैं।
– ‘प्राणायाम‘– कपाल-भाति, अनुलोम-विलोम आदि प्राणायाम नहीं, बल्कि श्वसन क्रियाएं हैं। मन, एक अत्यन्त वेगवान साधन, ईश्वर ने हमें अपनी मंजिल, जो बहुत दूर है, तक पहुंचने के लिए दे रखा है। इस वेगवान साधन को प्राणायाम की क्रिया के माध्यम से ही नियंत्रित किया जा सकता है। प्राणायाम में प्राणों को रोका जाता है। प्राणायाम चार ही है, जो पतंजलि ऋषि ने अपनी अमर कृति योग दर्शन में बताए हैं। प्राणायाम करते समय मन को खाली न रखें। प्राणायाम करते समय प्रभु से प्रार्थना करें कि हे प्राण प्रदाता! मेरे प्राण मेरे अधिकार में हों। प्राण के अनुसार चलने वाला मेरा मन मेरे अधिकार में हो।
–महर्षि पतंजलि के अनुसार-पहला प्राणायाम– फेफड़ों में स्थित प्राण को बाहर निकाल कर, बाहर ही यथा साम्थर्य रोकना और घबराहट होने पर बाहर के प्राण अर्थात् वायु को अन्दर ले लेना। दूसरा प्राणायाम– बाहर के प्राण को अन्दर अर्थात् फेफड़ों में लेकर, अन्दर ही रोके रखना और घबराहट होने पर रोके हुए प्राण को बाहर निकाल देना। तीसरा प्राणायाम– प्राण को जहां का तहां अर्थात् अन्दर का अन्दर व बाहर का बाहर रोक देना और घबराहट होने पर प्राणों को सामान्य चलने देना। चौथा प्राणायाम– पहले तीनों प्राणायामों में वर्षों के अभ्यास के पश्चात कुशलता प्राप्त करके ही इस प्राणायाम को किया जाता है।
प्राणों को अधिक देर तक रोकने में शक्ति न लगाकर विधि में शक्ति लगायें और कुशलता के प्रति ध्यान दें। प्राणायाम हमारे शरीर के सभी SYSTEMS को तो व्यवस्थित रखता ही है इससे हमारी बुद्धि भी अति सूक्ष्म होकर मुश्किल विषयों को भी शीघ्रता से ग्रहण करने में सक्षम हो जाती है। प्राणायाम हमारे शारीरिक और बौधिक विकास के साथ-साथ हमारी अध्यात्मिक उन्नति में भी अत्यन्त सहायक है। यदि प्राण को या सांस को तो रोक दिया, परन्तु मन पर ध्यान नहीं दिया, तो अज्ञान इस प्रकार नष्ट नहीं होता। प्राणों के स्थिर होते ही मन स्थिर हो जाता है। स्थिर हुए मन को परमात्मा के चिन्तन में लगायें।
-सामान्यतः ध्यान का अर्थ किसी विषय पर एकाग्र होने को लिया जाता है। ध्यान में एक ही विषय रहता है। हाँ, उस एक विषय पर भिन्न-भिन्न विचार हो सकते हैं। हम जितना किसी विषय में एकाग्र होते हैं, उतना अधिक हम उस विषय को सूक्ष्मता से समझ पाते हैं। इस लाभ को देखते हुए हमें अधिक से अधिक ध्यान की प्रक्रिया से जुड़ना चाहिए। ध्यान की प्रक्रिया में विचार-शून्य नहीं हो जाना होता। ध्यान में निर्विषय होने का अभिप्राय यह है कि, जिसका ध्यान करते हैं, उससे भिन्न कोई विषय नहीं हो। योग में ध्यान का अर्थ अपने चित्त को ईश्वर के गुणों पर एकाग्र करना है।
-जिस चीज में हम अपना लाभ देखते है, उस चीज में हमारा मन आसानी से लग जाता है। यदि ध्यान की प्रक्रिया में हमारा मन नहीं लग रहा तो उसके लाभों का हमें ओर गहराई से चिंतन करना चाहिए।
सर्वप्रथम, ‘ध्यान’ के लिए हमें सीधा, स्थिरता व सुख पूर्वक बैठने का अभ्यास करना चाहिए। शरीर की सम्पूर्ण शिथलता के लिए हमें अपने मन को शरीर के विभिन्न अंगों पर ले जाकर उनकी सुखपूर्वक स्थिति के लिए विचारशील होना होगा। इस दौरान, हमने अपनी साँस की गति को दीर्घ व एक जैसी रखना है।
-हम कैसे सीधा बैठने को सुनिश्चित करें? इसके लिए एक क्रिया सुझाई जाती है। कुर्सी या आसन आदि पर बैठने के पश्चात, अपने दोनों हाथों को ऊपर उठाते हुए अपने सिर के ऊपर मिला दें। अब, दोनों हाथों को ऊपर की ओर खींचे। शरीर की स्थिति को वैसा ही रखते हुए हाथों को वापिस ले आऐं। ऐसा करने पर, जो स्थिति कमर, गर्दन व सिर की होती है, वैसी ही तनाव-रहित स्थिति हमारे शरीर की ध्यान के समय होनी चाहिए। अगर, ध्यान के दौरान हमारे शरीर की स्थिति बदल जाती है तो, पुनः इस क्रिया को दोहरा सकते हैं। योग के पहले दो अंगों को छोड़कर शेष सभी अंगों में हमारे बैठने की स्थिति सीधी, स्थिर व सुखपूर्वक होनी चाहिए।
-जैसे बच्चा अपनी माँ की गोद में अपने को सुरक्षित अनुभव करता है, वैसे ही आप भी महसूस करें कि ईश्वर की गोद में आप सुरक्षित हैं। ईश्वर की सर्वत्र विद्यमानता को अनुभव करें। ध्यान के समय भूल से या अज्ञानता से यदि मन इधर-उधर जाए तो, तत्काल मन को पुन:-पुन: धारणा स्थल पर टिकाकर प्रभु की पूर्ण निष्ठा, श्रद्धा, प्रेम व तन्मयता से चिन्तन करें।
-यह बात सत्य है कि किये गये कर्मों का फल अवश्य मिलता है, चाहे कितना ही जप-तप करो, कितने ही यज्ञ-दान करो। फिर भी उपासना की आवश्यकता, इसलिए है कि उपासना करने से ईश्वर की ओर से विशेष ज्ञान, बल, आनन्द, धैर्य, सहनशक्ति, निष्कामता, उत्साह, पराक्रम, दयालुता, न्यायकारिता आदि गुणों की प्राप्ति होती है। उपासक की बुद्धि कुशाग्र होती है, स्मृति तीव्र होती है, एकाग्रता बढ़ती है, इन्द्रियों पर नियंत्रण होता है, मन पर अधिकार होता है, अज्ञान जनित कुसंस्कारों को जानने, उनको दबाने, निर्बल बनाने तथा उन्हें नष्ट करने का सामर्थ्य प्राप्त होता है और जब साधक यम-नियम का सूक्ष्मता से पालन करता है, तब जीवन शान्त, प्रसन्न, सन्तुष्ट, निर्भीक बनता है।
– ध्यान करते-करते जब आत्मा व परमात्मा का प्रत्यक्ष अर्थात् दर्शन होता है, उस प्रत्यक्ष को ही समाधि कहते हैं। जिस प्रकार आग में पड़ा कोयला अग्नि रूप हो जाता है और उसमें अग्नि के सभी गुण आ जाते हैं। उसी प्रकार समाधि में जीवात्मा में ईश्वर के सभी गुण प्रतिबिम्बित होने लगते हैं। जीवात्मा का प्रयोजन मुक्ति प्राप्ति है और समाधि से इस प्रयोजन की सिद्धि होती है। योग के छटे अंग ‘धारणा’ तक ही कोई दूसरा हमारी सहायता कर सकता है। कोई अन्य किसी का ध्यान व समाधि नहीं लगवा सकता।
– आठ अंगों में महर्षि पतंजलि ने मनुष्य को उसके अंतिम प्रयोजन तक पहुंचने का रास्ता बता दिया है। सभी मतवाले इस बात को मानते हैं कि असत्य, हिंसा आदि, जो कि अष्टांग योग के पहले अंग-यम के विरुध हैं- की राह पर चलने वाले ईश्वर को कभी नहीं पा सकते। यह इस बात की पुष्टि ही है कि ईश्वर को पाने का अष्टांग योग एक मात्र रास्ता है। यह कथन कि सारा ज्ञान अथवा सारे वेद हमारी आत्मा में हैं का तात्पर्य यह है, कि ज्ञान-स्वरूप परमात्मा हमारी आत्मा में पूर्णतया व्याप्त है, परन्तु परमात्मा, जो ज्ञान का अथाह भण्डार है, का साक्षात्कार करने के लिए हमें ‘समाधि’ को प्राप्त करना ही होगा।
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