सृष्टि बनाने का प्रयोजन

-ठीक है कि यह सृष्टि बनाकर ईश्वर ने अपने ज्ञान को अभिव्यक्त किया है। परन्तु क्या सृष्टि बनाने के प्रयोजन को इसी में समेट सकते हैं? जब हम जान चुके हैं कि ईश्वर का हर कार्य अपने लिए न होकर दूसरों के लिए ही होता है तो यह ‘दूसरे’ कौन हैं जिनके लिए यह सृष्टि बनाई गई? ईश्वर के अतिरिक्त आत्माएं ही चेतन हैं, तो अवश्य ही यह सृष्टि हम आत्माओं के लिए बनाई गई है। पर, हम आत्माओं के किस प्रयोजन की सिद्धि के लिए यह सृष्टि बनाई गई? बहुत सारे अन्य विषयों की भांति इस विषय पर भी दूसरी संस्कृतियों के विद्वान् मौन हैं। यह जानने से कि यह सृष्टि कैसे बनी, बहुत अधिक महत्त्वपूर्ण है यह जानना कि आखिरकार यह सृष्टि बनाई क्यों गई? 

-आत्मा शरीर के बगैर क्रिया नहीं कर सकती। उसकी सार्थकता ही इसमें है कि उसको शरीर मिले। वो कैसे? शरीर मिलने से वह, पहले किए कर्मों का यथारूप फल भोगने के साथ-साथ ऐसे कर्म कर सकता है, जिससे उसे मोक्ष की अवधि तक दोबारा जन्म न लेना पड़े। उसका शरीर के साथ संयोग करने से पहले यह आवश्यक है कि उसे सृष्टि रूपी व्यवस्था दी जाए, जिससे कि वह अपने कर्मों को अच्छी तरह से  कर सके। कुछ लोग शरीर का मृत्यु को प्राप्त होना ही मोक्ष का प्राप्त होना मानते हैं। इसका अर्थ तो यह हुआ कि जो कीड़े-मकोड़े मरते है, उनको भी मोक्ष प्राप्त हो जाता है।