सत्य और असत्य में भेद करने का हमारा सबसे महत्त्वपूर्ण साधन बुद्धि

-सत्य को मानने व जानने से पहले हमें कुछ तैयारी करने की आवश्यकता है। हमें अपनी कुछ कुछ विषयों से संबन्धित धारणाओं व मान्यताओं को संशोधित करना होगा।  यह ठीक वैसा ही है, जैसे साफ साफ देखने के लिए आँखों का स्वस्थ होना आवश्यक होता है। इस कर्म में पहला विषय है- बुद्धि

हमारे पास केवल एक ही औजार है, जिससे हम किसी चीज़ के सही व ग़लत होने का पता लगा सकते हैं और वो औजार है, हमारी बुद्धि। बहुतों के लिए उनके माता, पिता, पत्नी, बच्चे, मित्रगण व अच्छी सेहत सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। परन्तु, इन सभी को प्राप्त करने व बनाए रखने के लिए बुद्धि की आवश्यकता होती है। इस  हिसाब से बुद्धि ही हमारे लिए सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। जब हम बुद्धि के बगैर साधारण कार्य जैसे कि सब्जी खरीदना, गंतव्य स्थान पर ठीक समय पर पहुंचना, नल आदि को ठीक करना आदि ही नहीं कर सकते, तो यह समझना कि बुद्धि के बगैर हम अपने जीवन के अंतिम लक्ष्य को प्राप्त कर लेंगे, मूर्खतापूर्ण ही कहा जाएगा। इसलिए, यह कहना कोई अतिश्योक्ति नहीं कि हमारे जीवन में हमारे माता-पिता, स्वास्थ्य, समय आदि से भी अधिक महत्त्वपूर्ण होती है- हमारी बुद्धि। हमारे संस्कार कुछ इस तरह के हो गए हैं कि हम, यूँ तो, बुद्धि का बहुत प्रयोग करते हैं, पर जैसे ही किसी चीज़ का धर्म के साथ सम्बन्ध देखते हैं, हम वहाँ बुद्धि के प्रयोग को तिलांजलि दे देते हैं।  बुद्धि को तेज करने के लिए हमें हर धार्मिक क्रिया-कलाप में बुद्धि के प्रयोग की आदत डालनी होगी। हमें बुद्धि का प्रयोग का कोई भी अवसर नहीं छोड़ना है। 

बुद्धिमान शिक्षा से बना जाता है। यह बात सभी लोग जानते हैं, इसीलिए तो वो अपने बच्चों को बुद्धिमान बनाने के लिए अच्छे अच्छे स्कूलों में भेजते हैं। लेकिन, आज की शिक्षा व्यवस्था हमें बुद्धिमान न बनाकर कुछ सूचनाओं का संग्राहलय बनाकर ही इस संसार में छोड़ देती है। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात भी हम यह नहीं जानते होते कि आखिर हमारे मनुष्य जीवन का व सृष्टि की रचना का प्रयोजन क्या है? 

शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य है-अनुशासन और प्यार से, मानव का चरित्र निर्माण करना, जिससे वह अपने परिवार, समाज, राष्ट्र और विश्व का उद्धार कर सके। Physics, Chemistry, Biology, Economics आदि विषयों के सिद्धान्तों की जानकारियाँ देना ही शिक्षा नहीं है, बल्कि, यह बताना कि इन विषयों की जानकारियाँ किस तरह व्यक्ति को उसके आस्तित्व के उद्देश्य को पूरा करने में सहायक सिद्ध हो सकती हैं, ही वास्तविक शिक्षा है। साधारण शब्दों में यह कहा जा सकता है कि नैतिकता के बिना इन विषयों को जानना, अनावश्यक जानकारियाँ इकट्ठा करना मात्र है।

आइए, हम अपनी पुरानी शिक्षा व्यवस्था की तरफ लौट चलें।