प्रमाण

– किसी चीज की सत्यता को जानने के लिए जो तरीके  प्रयोग में लाए जाते हैं, उन्हें प्रमाण कहा जाता है। हमारे ऋषियों के अतिरिक्त, किसी अन्य संस्कृति के विद्वानों का इस विषय पर कोई लेख नहीं मिलता। प्रमाण चार हैं-प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द और उपमान। पहले हम प्रत्यक्ष प्रमाण के बारे में जानते हैं। जब हमें किसी वस्तु के बारे में ज्ञान, हमारी ज्ञानेन्द्रियां (आंख, कान, नाक, जिह्वा और त्वचा) और मन के उस वस्तु के साथ संयोग के कारण होता है, तो ऐसे ज्ञान को प्रत्यक्ष प्रमाण से हुआ न कह कर केवल प्रत्यक्ष कहा जाता है। किसी ज्ञान को प्रत्यक्ष प्रमाण से हुआ मानने के लिए उसे तीन कसौटियों से गुजरना पड़ता है। पहली शर्त- वह ज्ञान संशयात्मक नहीं होना चाहिए। संशयात्मक ज्ञान उसे कहा जाता है, जिसके बारे में हमारी बुद्धि एक निश्चित निर्णय पर न पहुंच  सके। दूसरी शर्त- उस ज्ञान में बदलाव सम्भव न हो। उदाहरण-प्रकाश की कमी में, दूर हमें एक व्यक्ति खड़ा दिखाई देता है और ऐसा ही हमारी बुद्धि द्वारा निश्चित कर दिया जाता है, परन्तु प्रकाश की मात्रा बढ़ने पर पता चलता है कि अँधेरे में जिसे हम व्यक्ति मान रहे थे, वह तो वास्तव में एक खंभा है। यहां पर हमारा ज्ञान परिवर्तित हो गया है। ऐसा ज्ञान जो बदल जाए या जो बदल सकता हो, प्रत्यक्ष प्रमाण के अंतर्गत नहीं माना  जाता। तीसरी व अंतिम शर्त- वह उसी इन्द्रिय का विषय होना चाहिए। हमारी आंख,कान आदि इन्द्रियों के अलग-अलग विषय हैं। यदि, कान से सुनने से हमें ताजमहल का ज्ञान हो, तो उसे प्रत्यक्ष नहीं कहा जाएगा। क्योंकि, ताजमहल कान का नहीं आंख का विषय है। इसी तरह यदि ‘पानी’ शब्द सुनने से, उस पदार्थ जिससे कि प्यास बुझती है का ज्ञान हो, तो ऐसा ज्ञान प्रत्यक्ष प्रमाण से प्राप्त नहीं माना जायगा, क्योंकि, ‘पानी’ पदार्थ कान का नहीं रसना का विषय है। इन दोनों उदाहरणों में जो ज्ञान हमें व्यक्ति की आवाज  की गुणवत्ता आदि के बारे में हुआ, उसे प्रत्यक्ष ही कहा जाएगा। 

-सामान्यता, जो  ज्ञान हमें हमारी ज्ञानेन्द्रियां और मन के किसी वस्तु के साथ संयोग के कारण होता है, ऐसे ज्ञान को प्रत्यक्ष कह दिया जाता है, परन्तु यह आवश्यक नहीं कि ऐसा ज्ञान सत्य ही हो।

क्योंकि, प्रमाणों  से प्राप्त ज्ञान हमेशा सत्य ही होता है,  हमारे प्रत्यक्ष ज्ञान को प्रमाण की कोटि में लाने के लिए हमें अपने ज्ञान को तीन परीक्षाओं में से गुजरना होता है। 1 वह ज्ञान संशयात्मक नहीं होना चाहिए। 2 उस ज्ञान में बदलाव सम्भव नहीं होना चाहिए। 3 वह ज्ञान किसी के शब्दों  से नहीं होना चाहिए। 

किसी के शब्दों  से  होने वाले ज्ञान को अलग से ‘शब्द प्रमाण’ के अन्तर्गत उल्लेखित किया गया है।  

इन तीन परीक्षाओं में उत्तीर्ण ज्ञान को ही प्रमाण कहा जा सकता है। 

-दूसरा प्रमाण, अनुमान प्रमाण माना जाता है। यदि, पहले हम प्रत्यक्ष कर चुके हैं कि दो विशिष्ट क्रियाएं हमेशा एक साथ व एक निश्चित क्रम से होती हैं, तो उनमें से एक क्रिया का प्रत्यक्ष करके दूसरी क्रिया का अनुमान से ज्ञान प्राप्त कर लिया जाता है। पूरी गली में पानी भरा देख कर हमें अनुमान हो जाता है कि जरूर यहां भारी वर्षा हुई है। ऐसे ज्ञान के लिए हमारा वर्षा को प्रत्यक्ष देखना जरूरी नहीं।  हमारे इस ज्ञान का अनुमान प्रमाण की कोटि में आने के लिए यह आवश्यक है कि हमने पहले प्रत्यक्ष देखा हो कि भारी वर्षा होने पर गली में पानी भर जाता है।                                                                                                             

-तीसरा प्रमाण शब्द प्रमाण है। इसमें हम किसी चीज की सत्यता के बारे में दूसरों के वचनों से जानते हैं, परन्तु प्रश्न उठता है किन वचनों को शब्द प्रमाण की कोटि में रखा जाए? किसी बच्चे के लिए किसी विषय पर कहे, उसके पिता के वचन ही प्रमाण होते हैं। इसी प्रकार, एक व्यक्ति Physics की किसी अवधारणा को प्रमाणित करने के लिए किसी physicist के विचारों का सहारा लेता है। अब, क्योंकि, वेद में सभी तरह का ज्ञान बीजरूप में उपलब्ध है व वेद किसी व्यक्ति द्वारा नहीं रचे गए हैं, इसलिए वेद या ऋषियों के वचनों को ही शब्द प्रमाण की कोटि में रखा जाता है।                                                                                                   

 शब्द प्रमाण की कोटि में आने के लिए किसी व्यक्ति का प्रत्यक्ष व अनुमान प्रमाण से किसी वस्तु के बारे में ठीक-ठीक जानना ही पर्याप्त नहीं होता। उस व्यक्ति में दो ओर चीजें होनी चाहिएं -दूसरों के हित की भावना व सत्य भाषण की इच्छा। कोई व्यक्ति सत्य जानते हुए भी अन्य दो चीजों के अभाव में असत्य व अहितकर कह सकता है। प्रत्येक साइंसदान व अन्य व्यक्ति, जिसमें उपरोक्त तीनों चीजें विद्यमान हों, के कथनों को शब्द प्रमाण माना जा सकता है। शब्द प्रमाण के अन्तर्गत आने के लिए इन तीनों चीजों के अतिरिक्त वेद नामी पुस्तक को जानना व मानना अवश्यंभावी नहीं।