उपासना में जप, भावना व ईश्वर-समर्पण 

ईश्वर के नाम का अथवा उसके स्वरूप को बताने वाले किसी वाक्य का बार-बार पाठ करना जप कहलाता है। यह जप यदि मानसिक हो, तो अति उत्तम। जप में बोले गए शब्द अथवा वाक्य का जो वाच्य अर्थात वस्तु ईश्वर है, उसके गुणों का सूक्ष्मता से विचार करने को ‘भावना’ कह दिया जाता है। उपासना की सफलता के पीछे तीन चीजों का होना बहुत आवश्यक है, एक- ईश्वर के वाचक किसी शब्द या वाक्य का जप, दो- वाच्य ईश्वर के स्वरूप का विचार, तीन- स्वयं को ईश्वर समर्पित करना।

भावना– ऊपर के वाक्यों से यह बोध होगा कि पाठ किए जाने वाले शब्द अथवा वाक्य को अर्थपूर्ण विचारना ही भावना है। ऊपर उसी स्थल पर ‘सूक्ष्मता’ शब्द का भी प्रयोग किया गया है। इस निबन्ध का प्रयोजन जप के संदर्भ में इन सभी बातों को स्पष्ट करना ही है। बिना अर्थ विचारे किसी भी शब्द का बार-बार पाठ करना व्यर्थ है। ‘भावना’ को एक उदाहरण से समझते हैं। जब हम प्रेम से किसी के सिर पर हाथ रखते हैं, तो हमारे ऐसा करते हुए हमारा मन प्रेम की भावना से ओत-प्रोत हो रहा होता है। ठीक उसी तरह जब हम ईश्वर के नाम का जप करें, तो उस जप किए गए शब्द अथवा वाक्य के अर्थ के साथ-साथ उसके पीछे ईश्वर की कृतज्ञता की भावना भी होनी चाहिए। मात्र अर्थ का शाब्दिक जप अधिक मायने नहीं रखता, जब तक पाठ की जाने वाली वस्तु का तात्विक बोध हमें न हो। जप की जाने वाली वस्तु में प्रेम आदि भावनाओं का प्रयोग हमें उस वस्तु का तात्विक बोध कराने में सहायक होता है। इसी अर्थ में ऊपर ‘सूक्ष्मता’ शब्द का प्रयोग किया गया है।    

ईश्वर-समर्पण– इसके मुख्यतः पाँच बिंदु हैं। 1 जो भी कार्य सामने आए, उसके बारे में ईश्वर से पूछना कि वह कार्य करना उचित है या अनुचित और ईश्वर-आज्ञा के अनुरूप केवल उचित कार्य को ही करना। 2 अपने पूरे ज्ञान, धन आदि से उस कार्य को करना और यह मानना कि सब ज्ञान, धन आदि उसी ईश्वर द्वारा दिया गया है। 3 कार्य को करते हुए सतत ईश्वर की विद्यमानता की अनुभूति बनाए रखना। 4 कार्य पूरा होने पर यह अनुभव करना कि उस ईश्वर की कृपा से ही कार्य पूर्ण हो पाया है। ऐसा अनुभव करते हुए ईश्वर का धन्यवादी होना। 5 इस कार्य के फ़लस्वरूप किसी तरह के सांसारिक सुख की कामना न करके मोक्ष-सुख की ही इच्छा करना।