आर्य समाज क्या है और आर्य होने के लाभ क्या हैं?
आज समाज में एक बहुत बड़ी विडम्बना व्याप्त है। वो यह कि आर्य समाज हिन्दू मान्यताओं को नहीं मानता, जैसे- एक आर्य समाजी न तो मूर्ति पूजा मानता है, न अवतारवाद मानता है और बहुत सी अन्य कर्मकांडों अथवा रीति-रिवाजों को नहीं मानता, इसलिए आर्य समाज हिन्दू विरोधी है।
हमारा वास्तविक नाम आर्य ही है, परन्तु कुछ कारणों से हमें हिन्दू नाम से जाना जाने लगा है। आज हमारे हिन्दू समाज में बलि प्रथा, मूर्ति पूजा, अन्धविश्वास, सुरापान, मांसाहार, बाल विवाह, सती प्रथा, स्त्रियों को शिक्षित न करना, कन्या-हत्या, भूत प्रेत, झाड़-फूँक आदि कुरीतियाँ बहुत बढ़ गईं हैं। इन्हीं कुरीतियों को दूर कर हमें वास्तविक सनातन धर्म का दिग्दर्शन कराने के लिए आर्य समाज नामक संगठन बनाया गया। क्योंकि हमारा सारा ज्ञान-विज्ञान वेदों पर ही आधारित है, इसलिए, आर्य समाज ने इसी की शिक्षाओं को प्रचारित करना अपना उद्देश्य बनाया। आर्य समाज के कारण आज बाल विवाह, सती प्रथा, स्त्रियों को शिक्षित न करना, कन्या-हत्या आदि कुरीतियों पर बहुत हद तक लगाम लग चुकी है। शहरों में तो स्त्रियों की शिक्षा आम बात हो गई है। ये बात ओर है कि इसका श्रेय कभी भी आर्य समाज को नहीं दिया जाता। स्त्रियों की शिक्षा में बहुत बढ़ोतरी होने के बावजूद बहुत से धर्म गुरु आज भी वेद के मंत्रों को स्त्रियों द्वारा पढ़ने के पक्ष में नहीं हैं। आज हमारे समाज में जो भी कुरीतियाँ प्रचलित हैं, उनका महर्षि दयानन्द ने वेदोक्त समाधान अपनी पुस्तक- सत्यार्थ प्रकाश में दिया है। परन्तु, स्वाध्याय की आदत न होने के कारण, जन सामान्य उन बातों से परिचित नहीं हो पाता।
हिन्दू समाज के तथा-कथित धर्म गुरु यह कहने का साहस तो नहीं जुटा पाते कि वेद हमारे धर्म-ग्रन्थ नहीं हैं, परन्तु वे हमारे समाज में व्याप्त कुरीतियों को वेद के किसी मंत्र से सिद्ध भी नहीं कर पाते। सच्चाई तो यह है कि वे वेद की शिक्षाओं से अनभिज्ञ हैं और अपने स्वार्थों के कारण वे वेद के सही अर्थों को झुठला देते हैं या वेद के नाम से गलत बातों को प्रचारित कर देते हैं, ताकि उनकी गद्दी, शिष्यों के बीच उनका मान-सम्मान आदि बना रहे।
आर्य समाज को हिन्दुओं के मन्दिरों से,उनकी मूर्तियों से कोई परहेज नहीं, मूर्तियां और महापुरुषों के चित्र तो आर्य समाजियों के घर में भी लगे हैं। परन्तु वे मूर्ति पूजा नहीं करते। पाखण्ड नहीं करते। मूर्तियों में प्राण नहीं डालते। वेद विरुद्ध कोई कार्य नहीं करते। आर्य बनने के लिए चोटी रखना, जनेऊ पहनना, सन्ध्या, हवन करना, शाकाहारी होना और वेद व ऋषियों के प्रति श्रद्धा रखना आवश्यक है।
हमें याद रखना आवश्यक है कि जब हैदराबाद के निजाम ने अपनी रियासत यानि अपनी हैदराबाद स्टेट में ऐलान किया था कि कोई नया हिन्दू मन्दिर नहीं बनेगा, पुराने की मरम्मत नहीं होगी, मन्दिरों में घण्टे-घड़ियाल नहीं बजेंगे, आरती नहीं होगी तब आर्य समाज ने आंदोलन खड़ा किया और हजारों की संख्या में आर्य समाजियों ने हैदराबाद पहुंचकर निजाम की जेल भर दी और निजाम की नाक में दम कर दिया। हैदराबाद के निजाम को अपना हुक्म वापस लेना पड़ा। आर्य समाज को हिन्दुओं ने समझा ही नहीं। आज हमारा समाज पोंगा पाण्डे, पुजारी, कथावाचक, महामण्डलेश्वरों के बहकावे में आकर अपना समय और धन दोनों बर्बाद कर रहे हैं। हमारा वास्तविक सरंक्षक व शुभ-चिन्तक तो आर्य समाज ही है।
आर्य होने के लाभ–
-आर्य समाज से सम्बन्ध रखने वाला व्यक्ति अंध-विश्वास में पड़कर कुरीतियों का निर्वहन करने से होने वाले पाप-कर्मों से बच जाता है।
-इस सिद्धान्त को जानकर कि किए हुए पाप-कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है, वह पाप-कर्मों को करके उन के फलों की क्षमा के लिए यत्न करने के बजाए, पाप-कर्मों को करना ही छोड़ देता है।
-उसे पता चल जाता है कि वेद के अनुसार पुण्य कर्म कौन-कौन से हैं और उन्हें कैसे किया जाना चाहिए।
-वह किसी बात को किसी विशेष व्यक्ति के मुख से सुनने के कारण अथवा किसी विशेष पुस्तक में लिखा होने के कारण अथवा किसी विशेष भाषा में लिखा होने के कारण नहीं मानता, बल्कि प्रमाणों से परखने के बाद ही वह किसी बात को मानता है।
-उसे कोई भी असत्य विचार से बरगला नहीं सकता।
-भूत-प्रेत उसे डरा नहीं पाते।
-वैदिक कर्मफल सिद्धान्त को समझने से, वह बहुत सी कुरीतियों से बच जाता है और वह पुरुषार्थ के महत्त्व को समझने लगता है।
-वह अपने शरीर को एक साधन के रूप में देखता है और उसे स्वस्थ रखने के लिए आवश्यक कदम उठाता है।
-वह पाखंडियों व विधर्मियों के हर प्रश्न का उत्तर दे पाने में समर्थ हो जाता है।
-अपने पूर्वजों की ज्ञान-राशि पर प्रफुल्लित हो, उसका आत्म-विश्वास बढ़ जाता है।
-वह अनपढ़ पुजारियों और कथावाचकों के वाक-जाल में फंसकर अपना समय और धन नहीं गंवाता।
-वह वेदों में वर्णित अपने अंतिम ध्येय को समझ पाता है और उसे प्राप्त करने के लिए सही रास्ता अपनाता है।
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