आर्य समाज की स्थापना का उद्देश्य

सनातन संस्कृति के स्वर्णिम काल के बारे  में जानना इस भूखण्ड के लोगों के लिए अत्यन्त गौरव का विषय है, परन्तु आज इसके बारे में बहुत कम लोग ही जानते हैं। आज कल हमारे देश में बच्चों को यहीं पढ़ाया जाता है कि मानव अपनी उत्पत्ति के प्रारम्भिक दौर में जंगली था, जंगलों में रहता था और पशुओं का शिकार करके अपना पेट भरता था। जब मानव की उत्पत्ति हुई, उसे समय वह बेशक जंगलों में रहता था, क्योंकि उस समय उसके रहने के लिए मकान तो बने हुए नहीं थे, परन्तु वह अज्ञानी कदापि न था। वेदज्ञान के रूप में सबसे उत्तम आश्रय उसके पास था। इसी ज्ञान के सहारे वह अपने आप को बिना किसी बाहरी नियंत्रण के सुव्यवस्थित कर पाया। धीरे-धीरे, वेदज्ञान के ही सहारे उसने भौतिक उन्नति भी कर ली।

उस काल में कोई किसी पर अन्याय नहीं करता था, कोई किसी की वस्तु पर कुदृष्टि नहीं डालता था। सभी दूसरों के साथ वैसा ही बर्ताव करते थे, जैसे बर्ताव की वे अपने साथ आपेक्षा रखते थे। सभी दूसरे प्रणियों के प्रति सद्भाव रखते थे। सभी को अपने अंतिम ध्येय की जानकारी थी और सभी उस ओर प्रयत्नरत रहते थे व इस तरह सभी आनन्दमय जीवन बिताते थे। लेकिन, उस काल में कोई दूसरों पर अन्याय क्यों नहीं करता था, सभी की चाहना सेवा लेने की बजाए अधिक से अधिक सेवा देने की क्यों होती थी और सभी चोरी आदि अशुभ कर्म क्यों नहीं करते थे? ऐसा केवल वेदज्ञान से सम्भव हो पाया था। वेदज्ञान के रहते लोग अपने व्यवहार को प्रत्यक्ष के कष्टों से बचने  के लिए न कर, परोक्ष के कष्टों से बचने  के लिए केंद्रित करते थे। चोरी, अन्याय आदि जो अशुभ कर्म है, उनसे  कुछ समय के लिए हमें लाभ हो सकता है, परन्तु, इनका अंतिम फल तो बुरा ही होता है। यह विवेक वेदज्ञान के रहते ही सम्भव है। इस काल में लोगों का पूर्ण जीवन वेदज्ञान पर आधारित होने के कारण, इस काल को वैदिक काल कहा जाता है।     

सृष्टि उत्पत्ति से महाभारत के युद्ध से 1000 वर्ष पहले तक इस भूभाग में ऐसा ही समय था।

महर्षि दयानन्द आर्य समाज की स्थापना करके हमें उसी समय में ले जाना चाहते थे। क्योंकि, ऐसा कर पाना वेदों के शुद्ध ज्ञान के बिना सम्भव नहीं था, इसलिए, उन्होंने वेदों के सार के रूप में आर्य समाज के दस नियम बनाए। स्वर्णिम वैदिक काल के बारे में सोच कर हमें आर्य समाज के उद्देश्य की महानता का अंदाजा हो जाता है।