हमारी संस्कृति का आधार- वेद

निम्नलिखित कारणों से वेद को ईश्वरीय ज्ञान माना जाता है:

  1. हमारे आचार्यों को ज्ञान उनके आचार्यों से मिला, हमारे आचार्यों के आचार्यों को ज्ञान उनके आचार्यों से मिला। ऐसे पीछे जाते जाएं, तो सृष्टि के प्रथम मनुष्य को ज्ञान देने वाला ईश्वर के अतिरिक्त ओर कोई नहीं हो सकता। 
  2. हमें अपनी जीवन-यात्रा सही ढंग से चलाने के लिए वनस्पति विज्ञान, भौतिकी विद्या, रसायन विद्या, भूविज्ञान, गणित विद्या आदि सभी विद्याओं की आवश्यकता होती है और इन सभी विद्याओं का ज्ञान वेद में मिलता है। ओर किसी भी ईश्वरीय ज्ञान कही जाने वाली पुस्तक में इन विद्याओं का थोड़ा सा भी जिक्र नहीं है।
  3. यह आवश्यक है कि इस तरह का ज्ञान सृष्टि के आरम्भ में मनुष्य मात्र को दिया जाए, अन्यथा, इस तरह के ज्ञान के दिए जाने से पहले जन्मे मनुष्यों के प्रति अन्याय होगा। इस कसौटी पर ईश्वरीय ज्ञान कही जाने वाली अन्य पुस्तकें बुरी तरह पिटती हैं।                                                                                                             

-कुछ लोगों का मानना है कि सत्य बातों को जानने के लिए वेद पर ही क्यों आश्रित हुआ जाए? जो जो बातें, जिस जिस मनुष्य की अच्छी लगें, उन्हें अपनाते जाइए। इस बात पर सूक्ष्मता से विचार करते हैं। यह सभी मानते हैं कि कोई भी मनुष्य पूर्ण नहीं। जब सम्भावना है कि मनुष्य के ज्ञान में न्यूनता हो सकती है, तो ईश्वर, जो कि पूर्ण है के शब्दों को छोड़कर, किसी मनुष्य के शब्दों का आश्रय लेना कैसे ठीक है? उसके पश्चात, ग्रहणकर्ता भी अपनी अपूर्णता के कारण किसी ठीक चीज को छोड़ सकता है और किसी गलत चीज को अपना सकता है। यदि हमें सौ प्रतिशत सत्य ही स्वीकार्य है तो हम सभी को वेद की शरण में आना ही पड़ेगा।

 -कुछ लोगों का मानना है कि व्यक्ति कर्म करने में स्वतन्त्र है, तो एक ही बात सभी पर क्यों थोपी जाए। हर व्यक्ति का अपना अपना सत्य हो सकता है। सभी लोगों को लता मंगेशकर की आवाज ही क्यों पसंद आए? कोई आशा भोंसले की आवाज को भी पसंद कर सकता है।  ठीक। लेकिन लता मंगेशकर और आशा भोंसले के संगीत के नियमों में कोई भिन्नता नहीं हो सकती। इस बात को एक ओर उदाहरण से समझने का प्रयत्न करते हैं। मान लीजिए, एक व्यक्ति ने लाल रंग की कमीज पहनी हुई है। अब दूसरों को सत्य बोलने के लिए यह मानना पड़ेगा कि अमुक व्यक्ति ने लाल रंग की कमीज पहनी हुई है। ऐसा कहने से, उस की कर्म करने की स्वतंत्रता छिन्न नहीं गई। वह कमीज का रंग बताने से इंकार भी कर सकता है और वह कमीज का लाल की बजाए कोई ओर रंग भी बता सकता है, लेकिन हम तभी उसके कहे को सत्य कहेंगे, जब वह कमीज को लाल रंग की कहेगा, अन्यथा उसे झूठा आदि कहा जाएगा। सत्य सभी के लिए एक ही होता है। सत्य, असत्य, न्याय, अन्याय आदि का निर्धारण ईश्वर द्वारा होता है और उनका ज्ञान वेद के माध्यम से हमें सुलभ करा देता है। मनुष्य केवल उस निर्धारित सत्य को जानता है। उस सत्य को जानकर उस के अनुरूप आचरण करने से ही मनुष्य की उन्नति सम्भव है। यह तथ्य वेद के प्रति हमारी श्रद्धा जगाने में सहायक हो।

-हमारे पूर्वजों की वेद के प्रति अगाध श्रद्धा थी। तो क्या हममें भी वेद के प्रति अगाध श्रद्धा होनी चाहिए? यदि हाँ, तो यह अन्ध-श्रद्धा नहीं होगी? हमें संशय, तर्क और श्रद्धा में भेद समझ लेना चाहिए। जब हम समझते हैं कि कोई विचार ठीक भी हो सकता और नहीं भी तो ऐसे ज्ञान को हम संशयात्मक कहते हैं। सत्य तक पहुँचने के लिए जिस प्रक्रिया (विचार तारतम्य) का प्रयोग किया जाता है, उसे तर्क कहते हैं। इस प्रक्रिया के प्रयोग से जो सत्य का निर्धारण होता है, जब उस विश्वास पर दृढ़ता आती है, उसे श्रद्धा कहा जाता है। जो विश्वास इस प्रक्रिया से न गुजरा हो, उसे अन्ध-विश्वास कहा जाता है। वेदों के प्रति श्रद्धा होने के लिए आवश्यक है कि उसे हम तर्क से गुजारें।

-किसी भी चीज पर, तब तक विश्वास नहीं करना चाहिए, जब तक कि उसे अपने विवेक से परख न लिया जाए। वेद के 20000 से ज्यादा मन्त्र हैं। उनको विवेक से परखने का क्या तरीका है? वेद के 10, 20, 100, 1000 आदि मन्त्रों का अवलोकन करें। परखने के लिए निर्धारित मन्त्रों की संख्या तब तक बढ़ाते जाएं जब तक वेद की सत्यता पर आपके मन में किसी भी तरह का संशय है। वेदों की भाषा संस्कृत नहीं, वैदिक संस्कृत है। हमारा दुर्भाग्य रहा है कि ऋषि दयानन्द से पहले जितने भी लोगों के वेदों के भाष्य उपलब्ध होते हैं, वो संस्कृत के विद्वान थे, वैदिक संस्कृत के नहीं। सारे विश्व में आर्य समाज ही एक ऐसी संस्था है जो वेदों के प्रचार व प्रसार में प्रयासरत है। इसलिए केवल आर्य समाज के किसी विद्वान द्वारा किए गए वेद-मंत्रों के भाष्य को ही देखें।