ध्यान, सन्ध्या और उपासना के मायने

ध्यान– ध्यान जड़ व चेतन दोनों तरह की वस्तुओं का किया जाता है। ध्यान किसी वस्तु विशेष का न होकर किसी विचार का भी हो सकता है। जब हम ध्यान को अत्यन्त व्यापक लेते हैं, तो संध्या और उपासना भी उसमें समाहित हो जाते हैं। ध्यान में मुख्यता विषय की एकतानता होती है। जब किसी विषय को निरंतरता से विचारा जाता है, तो उस प्रक्रिया को ध्यान कह दिया जाता है। और जब ध्यान में विषय ईश्वर हो, तो उसे ही उपासना भी कह दिया जाता है।

सन्ध्या– महर्षि दयानन्द ने वैदिक सन्ध्या अथवा ब्रह्म यज्ञ के रूप में वेद के कुछ मंत्रों को चिन्हित कर दिया है। ब्रह्म यज्ञ आर्यों अर्थात श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा किया जाने वाला प्रतिदिन का कार्य है। जब वेद के इन मंत्रों को प्रतिदिन विचारा जाता है, तो किन्हीं मंत्रों में हमारे शरीर के विभिन्न अवयवों व इन्द्रियों को स्वस्थ व शुद्ध रखने के लिए ईश्वर से याचना की जाती है, किन्हीं मंत्रों में इस ब्रह्माण्ड के बनने की प्रक्रिया व उसको बनाने वाले ईश्वर को विचारा जाता है, किन्हीं मंत्रों में ईश्वर की व्यापकता को समझा जाता है और किन्हीं मंत्रों में ईश्वर के स्वरूप का चिंतन किया जाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि संध्या के सभी मंत्रों में विषय की एकतानता तो अवश्यम्भावी है। संध्या के जिन मंत्रों से ईश्वर का चिंतन किया जाता है, उनका समावेश उपासना के अंतर्गत भी हो जाता है। वैदिक सन्ध्या के मंत्रों का उच्चारण मात्र करने को न तो ध्यान कहा जा सकता है और न ही उपासना। वैदिक सन्ध्या के मंत्रों को ईश्वर के स्वरूप में निमग्न होने के लिए सहारे के रूप में भी देखा जा सकता है। 

उपासना– उपासना के वास्तविक मायने हैं- ईश्वर के निकट बैठना व उसके आनन्द में निमग्न हो जाना। इस अर्थ में उपासना कोई क्रिया नहीं है, बल्कि यह वह स्थिति है, जहाँ हम अपने अक्रियाशील स्वरूप में स्थित हो जाते है और तभी हम ईश्वर के यथार्थ स्वरूप को अनुभूत कर पाते हैं। ईश्वर के यथार्थ स्वरूप में निमग्न होने के लिए वैदिक सन्ध्या के सभी मंत्रों का सहारा लेना आवश्यक नहीं होता।

ईश्वर के निकट बैठने की स्थिति को प्राप्त करने के लिए जिन क्रियाओं का सहारा लिया जाता है, उनको भी उपासना नाम से कह दिया जाता है।