धर्म क्या है?
– आज सबसे बड़ी समस्या इसी शब्द को लेकर है? आज के बुद्धिमानवर्ग के अनुसार मानवता सबसे बड़ा धर्म है। इस वाक्य का अर्थ तो यह निकलता है कि धर्म तो बहुत सारे होते हैं, परन्तु मानवता उनमें सबसे बड़ा है। और, सारे धर्मों में कुछ-कुछ अच्छाई होती है, परन्तु मानवता सर्वोच्च होने के कारण अच्छाई से ओत-प्रोत होती है। इस वाक्य के अनुसार जिस धर्म में, जो जो अच्छाई है, उसका पालन करना मानवतारुपी धर्म व जो जो बुराई है, उसका पालन करना मानवतारुपी धर्म के विरुद्ध है। इसका अभिप्राय यह हुआ कि उनके द्वारा माने जाने वाले धर्मों में से किसी भी एक धर्म को अकेले नहीं माना नहीं जा सकता।
-धर्म का सामान्य अर्थ होता है प्रकृति। जैसे पानी का धर्म है- नीचे की ओर बहना, ठंडक आदि उसी तरह मनुष्य का धर्म है, मनुष्यत्व। किसी भी अवस्था में मनुष्यत्व एक से अधिक नहीं हो सकता। इसका अर्थ हुआ कि वास्तव में मनुष्य का धर्म एक ही होता है। जो विश्वास, आज धर्म के नाम से जाने जाते हैं, वो धर्म न होकर सम्प्रदाय हैं। मनुष्यत्व को अगर परिभाषित करना हो तो हर वो कार्य जिससे मनुष्य की उन्नति हो, मनुष्यत्व की कोटि में आएगा। अगर किसी को भी धोखा न देना, सत्य बोलना आदि मनुष्यत्व है, तो यह कहा जा सकता है कि हर मनुष्य का धर्म है कि वह किसी को धोखा न दे, सत्य बोले आदि आदि।
-यदि मनुष्यत्व ही एकमात्र धर्म है और संसार के सभी सम्प्रदाओं में मनुष्य की उन्नति व अवनति दोनों के लिए उपदेश हैं, तो हमारा दायित्व बन जाता है कि जिस भी सम्प्रदाय में हम पैदा हुए हों, उस सम्प्रदाय की सत्य बातों को अपना लें और उस सम्प्रदाय की असत्य बातों को ठुकरा दें। इसके साथ-साथ यह भी हमारा दायित्व है कि हम दूसरे सम्प्रदाओं की सत्य बातों को ग्रहण करें। सत्य पर किसी भी सम्प्रदाय का एकाधिकार नहीं है। इन बातों को करना बहुत कठिन है। परन्तु, हमारा मनुष्य होना तभी सार्थक है, जब हमारा ध्येय मनुष्यत्व को धारण करना ही हो और यह तभी सम्भव है जब हम सत्य के आग्रही बनें।
– बाहरी चिन्ह किसी को धर्मात्मा नहीं बनाते। कपड़े कैसे पहनें या बाल कैसे रखें आदि बातें देश, काल, ऋतु और रुचि पर आधारित हैं। काला या पीला चोगा पहनना, कण्ठी माला धारण करना, तिलक लगाना, जटा बढ़ाना आदि बातों का धर्म से कोई सम्बन्ध नहीं है। सार रूप में कहा जाए, तो, हर वह कर्म, जो हमें हमारे प्रति किया जाना अच्छा लगता हो, वह धर्म है। जैसे, हम चाहते हैं कि दूसरे हमसे सत्य बोलें तो सत्य-भाषण धर्म है, दूसरे हमें कष्ट न पहुचाएं तो अहिंसा धर्म है आदि। और हर वह कर्म जो हमें हमारे प्रति किया जाना अच्छा न लगता हो वह अधर्म है। जैसे, हम नहीं चाहते कि कोई हमारे बारे में बुरा सोचे व हमसे द्वेष रखे, तो दूसरों के प्रति बुरा सोचना व दूसरों से द्वेष रखना अधर्म है।
-जब किसी व्यक्ति के कपड़े आदि उसकी धार्मिकता का परिचायक नहीं होते, तो उसके धार्मिक व अधार्मिक होने का पता कैसे चलता है? महर्षि मनु के अनुसार वह व्यक्ति सुख, दु:ख, हानि, लाभ, मान, अपमान में धैर्य नहीं खोता। वह सहनशील होता है। उसके अधिकतर कर्मों में ‘कोई बात नहीं‘ की भावना चरितार्थ होती है। वह शरीर के अन्दर की तथा बाहर की शुद्धि रखता है। वह मन से भी दूसरों के पदार्थों का ग्रहण नहीं करता। वह अपना अधिकतर समय व साधन, विद्या और बुद्धि को बढ़ाने में लगाता है। वह सदा मन को बुरे चिन्तन से हटाकर अच्छे कामों में लगाता है। उसने क्रोध पर विजय पाई होती है।
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