आज की व्यवस्थाएं
मौलिक विषयों के अंतिम सत्य को जानने से पहले अच्छा होगा कि हम आज की व्यवस्थाओं के सत्य को पहचान लें।
-आज शिक्षा न्याय, भेषज (medicine) आदि से संबद्ध कोई भी व्यवस्था हमारी अपनी संस्कृति के अनुरूप नहीं है, बल्कि, ये सभी व्यवस्थाएं अंग्रेजी तंत्र की देन हैं। यदि, ये व्यवस्थाएं अंग्रेजी तंत्र की देन हैं भी, तो, इनमें गलत क्या है और हमें इन्हें बदलने की क्या आवश्यकता है? हमारे ऋषियों द्वारा दी शिक्षा, न्याय, भेषज आदि से सम्बद्ध सभी व्यवस्थाएं बड़ी उच्च कोटि की हैं।
हमारे ऋषियों द्वारा दी व्यवस्थाओं और अंग्रेजों द्वारा दी व्यवस्थाओं की तुलना के लिए आवश्यक है कि हम अपने ऋषियों द्वारा दी व्यवस्थाओं को भी जानें और उसके बाद निर्णय करें कि कौन सी व्यवस्थाएं हमारे लिए अधिक लाभकारी हैं।
– समाज को सुचारु रूप से चलाने के लिए, अपने ऋषियों द्वारा दी शिक्षा, न्याय, भेषज आदि व्यवस्थाओं का आलम्बन आवश्यक है। अंग्रेजों द्वारा दी ये व्यवस्थाएं समाज को सही दिशा देने में असमर्थ हैं। हमारे ऋषियों द्वारा दी व्यवस्थाओं के कारण ही हम महाभारत के काल तक विश्व गुरु रहे हैं। जबकि, अंग्रेजों द्वारा दी व्यवस्थाएं सामाजिक कुरीतियों को बढ़ाने वाली साबित हुईं हैं। एक ध्यान देने योग्य विचित्र बात यह है कि सामाजिक व्यवस्थाओं में स्थायी परिवर्तन तभी सम्भव है, जब हम सही से व्यैक्तिक मर्यादायों की पालना करें। और व्यैक्तिक मर्यादायों की सही से पालना करने के लिए हमें अपनी संस्कृति को जानना व अपनाना बेहद आवश्यक है।
– कुछ लोगों का मानना है कि क्योंकि, सामाजिक व्यवस्थाओं में स्थायी परिवर्तन राजतन्त्र द्वारा ही सम्भव है, इसलिए, व्यक्ति का इस संबंध में किसी भी तरह का कोई भी योगदान नहीं हो सकता। राजतंत्र का हिस्सा कहे जाने वाले व्यक्ति भी हमारे द्वारा निर्मित समाज से ही निकल के आते हैं। जैसे हम लोग होंगे, वैसे ही लोग राजतंत्र का हिस्सा बनेंगे। यदि, हम चाहते हैं कि हमारे राजतंत्र के व्यक्ति समझदार व अपने अतीत पर गौरव करने वाले हों, तो, हमें भी अपने अंदर वहीं गुण लाने होंगे।
– अंग्रेजों द्वारा दी शिक्षा, न्याय, भेषज आदि व्यवस्थाएं सामाजिक कुरीतियों को बढ़ाने वाली हैं। आज समाज में अपने पूर्वजों को निकम्मा माना जाने लगा है। हममें से बहुत से लोग आज की व्यवस्थाओं के समर्थन में खड़े हो जाते हैं क्योंकि, हमें अपने पूर्वजों के कार्यों का ज्ञान नहीं है। और तो और, समाज में बहुत कम लोग हैं, जो, अपने पूर्वजों के कार्यों को जानकर, अपने को सौभाग्यशाली समझते हैं कि उन्होंने इस देश में जन्म लिया। विचारों की यह श्रृंखला अपने लोगों को झकझोड़ने के लिए है।
– आज की शिक्षा व्यवस्था- क्या आज की शिक्षा व्यवस्था, इस मौलिक ज्ञान को देने में सक्षम है? क्या इस तरह के विचार देना शिक्षा व्यवस्था का दायित्व नहीं है? यहां पर दिए गए सभी विचार, हमारी प्राचीन शिक्षा व्यवस्था में विद्यार्थी को शुरु के 1-2 वर्षों में ही दे दिए जाते थे। इतना पढ़ लिख कर भी हम क्यों धर्म के नाम पर अत्यंत तर्कहीन बातों को मान लेते हैं? ऐसा इसलिए है क्योंकि, हमारी शिक्षा व्यवस्था स्वयं नहीं जानती कि उसके विद्यार्थियों की अंतिम मंजिल कौन सी है, जहां लेकर जाने के लिए उसे अपने विद्यार्थियों का साधन बनना है?
– आज की न्याय व्यवस्था- आज न्याय के नाम पर केवल फैसले होते हैं। वकील व कचहरियां व्यक्ति को अत्यंत परेशान करते हैं, इसलिए, आम व्यक्ति इनके चक्कर से बचने में ही अपनी भलाई समझता है। बदकिस्मती से, न्याय व्यवस्था के साथ जुड़े लोग न्याय अन्याय का अर्थ भी नहीं जानते होते। आज न्यायाधीश, वकील आदि केवल मात्र पदवियाँ हैं और इनमें से कुछ लोग दंड देने के उद्देश्य को भी भलि प्रकार से नहीं जानते होते। वास्तविकता यह है कि केवल वहीं व्यक्ति न्याय कर सकता है, जिसमें मानवता के सभी गुण विद्यमान हों। और वेद मानवता के गुणों का एक मात्र स्रोत हैं।
– आज की पुलिस और सैन्य व्यवस्था- लोगों का विश्वास आज की पुलिस व्यवस्था पर न के बराबर है। लोग पुलिस के पास तभी जाते हैं, जब समाज में रहने के लिए, उनके पास ओर कोई विकल्प नहीं बचता। ऐसा इसलिए है, क्योंकि, पुलिस का मुख्य ध्येय अच्छे लोगों को असामाजिक तत्वों से सुरक्षा प्रदान करना नहीं है।
सैन्य व्यवस्था का यह हाल है कि जिन लोगों पर देश की सुरक्षा का भार है, उन्हें भिन्न भिन्न योजनाओं के तहत शराब पीने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।
– आज की चिकित्सा व्यवस्था- आज व्यक्ति की 25 % से अधिक आय चिकित्सा पर खर्च हो रही है। जहां, चिकित्सा, एक सेवा होनी चाहिए थी, वहां, यह एक व्यापार बन गया है। चिकित्सक, दवाइयां बनाने व बेचने वाले और टैस्ट करने वाले बेहद संगठित हो के मरीजों का शोषण करने में लगे हुए हैं। चिकित्सा व्यवस्था का मुख्य ध्येय पैसा कमाना ही रह गया है। ऐसी कोई अंग्रेजी दवाई नहीं मिलेगी, जिसके साइड इफेक्ट्स न हों। अंग्रेजी चिकित्सा व्यवस्था का तंत्र ही कुछ ऐसा है कि यह सस्ती, अधिक प्रभावशाली और आसानी से सुलभ दूसरी चिकित्सा पद्वतियों को पनपने ही नहीं देती।
– आज की अर्थ व्यवस्था- केवल कृषि ही होती है, जहां output, input से कई गुणा अधिक होता है, परन्तु, फिर भी सारे विश्व की अर्थ व्यवस्था में औधोगिकता का बोलबाला है। उधार की पूंजी पर निर्भरता की मनोवृति बढ़ती जा रही है। आज के बुद्धिजीवी इस बात पर मौन हो जाते कि किस तरह के धंधों से अर्थ उपार्जन करना चाहिए और किस तरह के धंधों से नहीं। बुरे नियंत्रण के कारण बहुत सारा अर्थ समाज की सामूहिक प्रगति में न लगकर राजतंत्र की समृद्धि में लग जाता है।
– आज का राजतन्त्र, लोगों की भलाई से अधिक अपने व अपने परिवार के यश के लिए आतुर रहता है।
यदि, सभी मुख्य देश आंतकवाद के खिलाफ हैं, तो, आंतकवादियों के पास इतना गोला बारूद कहां से आता है?
आज मांसाहारी भोजन करना व शराब पीना आम हो गया है। आखिर, हमारे खाने-पीने की आदतों में क्या प्रगति हुई है?
– आज पत्रकारिता का उद्देश्य बनकर रह गया है कि कैसे चोर से कहलवाया जाए कि उसने चोरी की है। पत्रकार इसी तरह, बगैर स्वयं सत्य को जानने की आवश्यकता के, समाज के प्रति अपना दायित्व निभाना अपना धर्म मानने लगे हैं। वे चाहते हैं कि वे खुद तो सत्य असत्य का परीक्षण न करें, परन्तु, उनकी खबरें देखने व सुनने वाले लोग खुद सत्य असत्य का परीक्षण करें, चाहे वे इस परीक्षण की योग्यता रखते हों व नहीं।
-आज समाज को केवल बाज़ार के रूप में देखा व आंका जाने लगा है। 90 % से अधिक विज्ञापन और फिल्में हमारे चरित्र का हनन करने वाले होते हैं। आज हिंसात्मक और अश्लील साहित्य का प्रचार जोरों पर है। क्या हमें नहीं विचारना चाहिए कि क्या किसी एक क्षेत्र में भी पाश्चत्य संस्कृति ने आदर्श स्थापित किया है या आदर्श स्थापित करने की ओर अग्रसर है? अगर नहीं, तो, हम अपनी संस्कृति को जानने की तरफ क्यों नहीं झुकते?
– यह ठीक है कि ये व्यवस्थाएं अंग्रेजों द्वारा दी गई हैं व इनमें बुराइयां भी हैं, परन्तु क्या बुराइयों के दूर कर दिए जाने पर वे अच्छी व्यवस्थाओं में नहीं बदल सकतीं? वास्तव में, हमारी सामाजिक व्यवस्थाओं की यह दशा हमारे व्यैक्तिक चरित्र के पतन से हुई है और पाश्चात्य संस्कृति के पास व्यैक्तिक चरित्र के उत्थान का कोई road map नहीं है। इसका हल सत्य ज्ञान पर आधारित व्यैक्तिक चरित्र निर्माण ही है और सत्य ज्ञान का एक मात्र स्रोत ‘वेद’ हैं।
अच्छाई के स्रोत को न जानने के बावजूद, पश्चिमी समाज ने विचारों को निखारने की दिशा में बहुत कार्य किया है।
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