अहंकार – एक उपकरण
-मुनि सत्यजित आर्य
वैदिक वाङ्गमय में आत्मा को उसके स्वत्व का बोध करने वाले उपकरण को अहंकार कहा गया है। हमारे हर कार्य के साथ जो मैंपना है, वही अहंकार का कार्य है। इस स्वत्व के बोध के बिना आत्मा का होना न होने के समान है। वैसे प्रत्येक क्रिया हमारे शरीर में ही होती है व हमारा आत्मा पूर्णतया निष्क्रिय है, परन्तु किसी जड़ वस्तु को कर्त्ता नहीं माना जा सकता इसलिए, जड़ वस्तु में हुई क्रिया के पीछे जो चेतन वस्तु होती है, उसी को कर्त्ता माना जाता है। ठीक वैसे ही, जैसे जड़ तलवार को नहीं, बल्कि जड़ तलवार से हत्या करने वाले व्यक्ति को ही हत्यारा माना जाता है। वैदिक वाङ्गमय में प्रयोग होने वाला अहंकार हिंदी में प्रयोग होने वाले ‘अहंकार’ शब्द से बिलकुल असम्बद्ध है।
आजकल, अध्यात्म से सम्बन्धित एक बहुत बड़े वर्ग की मान्यता यह है कि अहंकार अर्थात मैंपने का होना ही हमारी मुक्ति में सबसे बड़ा बाधक है। इसलिए, वे ‘मैं’ और ‘मेरा’ शब्दों का प्रयोग बन्द कर देते हैं और वे यह सोचते हैं कि ऐसा करने से वे, अर्थात उनकी आत्माएँ ‘कृतृत्व’ से मुक्त हो जाती हैं। जो कर्त्ता नहीं, वो भोक्ता भी नहीं हो सकता। इसलिए, उनके कर्म उनको बांधने वाले नहीं होते और वे मुक्ति की तरफ अग्रसर हो जाते हैं। उनका ऐसा सोचना सर्वथा गलत है। यह ठीक वैसा ही है, जैसे बिल्ली को देखकर कबूतर यह सोचकर ऑंखें बन्द करले कि उसके न देखने से बिल्ली भी उसको नहीं देख पाएगी। ऐसे लोग ‘मैं’ शब्द के स्थान पर ‘हम’ शब्द का प्रयोग करने लगते हैं, जोकि ‘मैं’ का बहुवचन है। वस्तुतः व्यवहार के लिए भाषा का प्रयोग किसी भी तरह से हमारी मुक्ति में बाधक नहीं है।
‘मैं’ शब्द बाधक तब हो जाता है, जब हम इसका प्रयोग आत्मा के लिए न करके इस शरीर के लिए करने लगते हैं। जो ‘मैं’ से अपनी आत्मा ही समझते हैं, उन्हें भी व्यवहार के लिए सामने वाले व्यक्ति के अनुरूप ‘मैं’ शब्द का शरीर के लिए भी उपयोग करना पड़ता है। अपने और पराए का बोध अहंकार तत्व के कारण ही सम्भव है और यह बोध आपसी व्यवहार के लिए अति आवश्यक है। अहंकार तत्व किसी भी तरह से त्याज्य नहीं है। अहंकार को इसके शुद्ध स्वरूप में ही ग्रहण करना होता है और इसका शुद्ध स्वरूप है- आत्मा को उसके स्वत्व का बोध करने वाला।
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